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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 29

repealed

Document

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

आईपीसी में ‘दस्तावेज़’ की व्यापक और प्रौद्योगिकी-निरपेक्ष परिभाषा इसलिए आवश्यक थी ताकि जालसाज़ी, cheating (धोखा), और fraud (कपट) जैसे अपराध (जिनकी परिभाषा संहिता के अन्य भागों में है) उन सभी लिखित या अंकित सामग्रियों पर लागू हो सकें जो साक्ष्य के रूप में काम आती हैं, न कि केवल औपचारिक काग़ज़ी अभिलेखों पर। इससे यह सुनिश्चित होता है कि कानून अलग-अलग पदार्थों और सूचना लिखने/रिकॉर्ड करने के तरीकों के साथ कदम मिला कर चले।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने इस अनुभाग के तहत ‘दस्तावेज़’ की व्याख्या व्यापक रूप से की है और माना है कि यह परिधानों, धातु की तख्तियों, दीवारों जैसे अपरंपरागत सतहों पर लिखी बातों तथा टाइप या मुद्रित सामग्री को भी कवर करता है, बशर्ते वह अक्षरों, अंकों या चिन्हों के माध्यम से अर्थ प्रेषित करती हो और साक्ष्य का कार्य कर सके। न्यायालयों ने इस परिभाषा को धारा 464 (कृत्रिम दस्तावेज़ बनाना) तथा जालसाज़ी-संबंधी अपराधों से जोड़कर यह तय करने में भी उपयोग किया है कि दंडनीय झूठा दस्तावेज़ क्या होता है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: ‘दस्तावेज़’ अवश्य ही प्रमाणपत्र या अनुबंध जैसे आधिकारिक काग़ज़ होने चाहिए।

    तथ्य: अदालती व्याख्या के अनुसार, कोई भी पदार्थ जिस पर अक्षर, अंक या चिन्ह हों—चाहे अनौपचारिक नोट हों या अपरंपरागत सतहें—यदि वह साक्ष्य बन सकते हों, तो ‘दस्तावेज़’ हो सकते हैं।

  • मिथक: केवल हस्तलिखित वस्तुएँ ही दस्तावेज़ मानी जाती हैं।

    तथ्य: मुद्रित, टाइप किए हुए या अन्य तरीके से अंकित पदार्थ भी दस्तावेज़ माने जाते हैं, बशर्ते वे ऐसे अक्षर, अंक या चिन्ह का उपयोग करें जो साक्ष्य बनने में सक्षम हों।