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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 205

repealed

False personation for purpose of act or proceeding in suit or prosecution

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

भारत में अदालतें और विधिक कार्यवाही इस बात पर निर्भर करती हैं कि पहचान सच्चाई से स्थापित हो—चाहे वह गवाह हों, पक्षकार हों, ज़मानती हों या अभियुक्त। यदि कोई व्यक्ति बिना दंड के कानूनी कार्यवाही में किसी अन्य का भेष धर सके, तो लोग जवाबदेही से बच सकते हैं, निर्दोषों को फँसा सकते हैं, या अदालत के निष्कर्षों को छलपूर्वक प्रभावित कर सकते हैं। दंड संहिता, 1860 की धारा 205 न्यायिक तथा अर्द्ध-न्यायिक प्रक्रियाओं की निष्पक्षता की रक्षा के लिए जोड़ी गई थी, ताकि ऐसे भेषधारण को अपराध ठहराया जाए जो वास्तविक कानूनी परिणाम पैदा करे—जैसे झूठी स्वीकारोक्ति, निर्णय, या जमानत की व्यवस्था।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह कानून तभी लागू होता है जब कोई व्यक्ति किसी मशहूर या महत्वपूर्ण हस्ती का भेष धरता है।

    तथ्य: यह किसी भी व्यक्ति का भेष धरने पर लागू होता है, केवल महत्वपूर्ण व्यक्तियों पर नहीं—महत्वपूर्ण यह है कि भेषधारण किसी कानूनी प्रक्रिया जैसे अदालती कार्यवाही के दौरान हो।

  • मिथक: इस अपराध के लागू होने के लिए आपको हानि या आर्थिक क्षति कराना अनिवार्य है।

    तथ्य: इस धारा के अनुसार बस इतना आवश्यक है कि कोई व्यक्ति किसी और का झूठा रूप धरे और कानूनी कार्यवाही के दौरान उसी झूठी पहचान में कार्य करे—वास्तविक हानि या नुकसान इस प्रावधान के अंतर्गत आवश्यक तत्व नहीं है।