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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 202

repealed

Intentional omission to give information of offence by person bound to inform

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

भारतीय दंड संहिता का प्रारूप तैयार करने वाले औपनिवेशिक काल के विधिनिर्माताओं का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि जिन वर्गों पर अन्य विशेष विधियों के तहत अपराधों की सूचना देने का वैधानिक दायित्व है, वे वास्तव में ऐसा करें, ताकि न्याय प्रणाली सुचारू चले और अपराध अनदेखे न रह जाएँ। यह धारा ऐसी रिपोर्टिंग ड्यूटी का जान-बूझकर उल्लंघन करने पर आपराधिक दंड के माध्यम से उसे सुदृढ़ करती है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

अदालतों ने सामान्यतः माना है कि यह धारा तभी लागू होती है जब किसी अन्य कानून द्वारा अधिकारियों को अपराध की सूचना देने का विशेष वैधानिक दायित्व बनाया गया हो; केवल नैतिक या सामाजिक दायित्व पर्याप्त नहीं है। अदालतों ने यह भी रेखांकित किया है कि चूक जान-बूझकर होनी चाहिए और व्यक्ति को वास्तव में अपराध के होने का ज्ञान हो या विश्वास करने का कारण हो—लापरवाही या अनभिज्ञता में की गई चुप्पी पर यह धारा लागू नहीं होती।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह कानून यह नहीं कहता कि हर व्यक्ति को हर ज्ञात अपराध की रिपोर्ट करना ही होगा, नहीं तो सज़ा मिलेगी।

    तथ्य: अदालतों ने स्पष्ट किया है कि यह धारा सिर्फ उन लोगों पर लागू होती है जिन पर किसी अन्य कानून या नियम द्वारा रिपोर्ट करने का विशिष्ट वैधानिक दायित्व बनाया गया है—ऐसे सामान्य दर्शकों पर नहीं जिन पर कोई औपचारिक बाध्यता नहीं है (सरलीकृत)।

  • मिथक: अपराध की रिपोर्ट करना भूल जाना या यह समझ में न आना कि अपराध हुआ है—ऐसी स्थिति में भी इस धारा के तहत सज़ा दी जा सकती है।

    तथ्य: यह धारा उस व्यक्ति द्वारा ‘जान-बूझकर’ की गई चूक की माँग करती है, जिसे अपराध के होने का ‘ज्ञान हो या विश्वास करने का कारण’ हो—दुर्घटनावश या अज्ञानतावश बनी चुप्पी इसके दायरे में नहीं आती।