Indian Penal Code, 1860
धारा 171I
repealedFailure to keep election accounts
Whoever being required by any law for the time being in force or any rule having the force of law to keep accounts of expenses incurred at or in connection with an election fails to keep such accounts shall be punished with fine which may extend to five hundred rupees.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
भारतीय चुनावी कानून, विशेष रूप से जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951, प्रत्याशियों को अपने चुनावी व्यय का लेखा-जोखा रखना और बाद में जमा करना अनिवार्य करता है, ताकि मतदाता और प्राधिकार यह परख सकें कि व्यय-सीमाओं का पालन हुआ या नहीं और कहीं भ्रष्ट आचरण तो नहीं हुआ। दंड संहिता की धारा 171I इस अभिलेख-रखाव दायित्व को आपराधिक दंड से सहारा देती है, जिससे प्रत्याशी इस बाध्यता को गंभीरता से लें और चुनाव प्राधिकारियों के पास वह कानूनी साधन रहे जिसका उपयोग तब किया जा सके जब कोई व्यक्ति बिल्कुल भी हिसाब-किताब न रखे।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
अदालतों ने सामान्यतः इस धारा को संकुचित, तकनीकी अपराध की तरह माना है—यह खाते न रखने के दोष को दंडित करती है, न कि खातों की शुद्धता या ईमानदारी को (वे विषय अलग से निपटाए जाते हैं, जिनमें चुनावी कानून के अपात्रता प्रावधान भी शामिल हैं)। चुनाव संबंधी मामलों में अक्सर जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की अपनी प्रक्रियाओं—जैसे अनुचित खातों पर अपात्रता—पर अधिक जोर रहा है, और धारा 171I का उद्धरण प्रकाशित निर्णयों में अपेक्षाकृत कम देखने को मिलता है (सरलीकृत)।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह धारा प्रत्याशियों को चुनाव में बहुत अधिक पैसा खर्च करने के लिए दंडित करती है।
तथ्य: यह केवल खर्च का लिखित हिसाब न रखने को दंडित करती है; अधिक खर्च करना या व्यय-सीमा का उल्लंघन करना अलग चुनावी प्रावधानों के तहत निपटाया जाता है।
मिथक: इस धारा के तहत लगाया जाने वाला जुर्माना कड़ा है।
तथ्य: अधिकतम जुर्माना मात्र पाँच सौ रुपये है, जिससे यह दंड संहिता के चुनाव-सम्बंधी अपराध प्रावधानों में सबसे हल्के दंडों में से एक बन जाता है।