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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 171A

repealed

Candidate , Electoral right defined

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह परिभाषात्मक खंड 1920 में भारतीय दंड संहिता में (संशोधन के माध्यम से) जोड़ा गया था, ताकि रिश्वत, अनुचित प्रभाव, प्रतिरूपण (दूसरे का रूप धरना) और चुनावों में असत्य कथन जैसे नए अपराधों—धारा 171B से 171I—को समर्थन मिल सके, जो ब्रिटिश औपनिवेशिक सुधारों के तहत प्रतिनिधिक चुनावों की ओर बढ़ते भारत में लाए गए थे। स्पष्ट परिभाषाओं के बिना ‘उम्मीदवार’ और ‘निर्वाचन अधिकार’ जैसे शब्द बहुत व्यापक या बहुत संकीर्ण अर्थ ले सकते थे, जिससे चुनावी अनियमितताओं पर समान रूप से अभियोजन चलाना कठिन हो जाता।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

अदालतों ने सामान्यतः इसे एक सीधे-सादे परिभाषात्मक उपबंध के रूप में माना है, जिस पर स्वतंत्र वाद-विवाद सीमित रहा है। इसका प्रमुख कार्य व्याख्यात्मक है: जब अदालतें धारा 171B (रिश्वत), 171C (अनुचित प्रभाव) या 171F (इन अपराधों का दंड) के मामलों का निर्णय करती हैं, तो वे धारा 171A की ओर लौटकर देखती हैं कि संबंधित व्यक्ति विधिक रूप से ‘उम्मीदवार’ था या नहीं, और कथित रूप से जिसका उल्लंघन हुआ वह अधिकार यहाँ परिभाषित ‘निर्वाचन अधिकार’ के दायरे में आता है या नहीं।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: जो भी व्यक्ति पद के लिए चुनाव लड़ने की योजना बनाता है, वह अपने-आप इस कानून के तहत ‘उम्मीदवार’ माना जाता है।

    तथ्य: धारा 171A के अनुसार, कोई व्यक्ति केवल औपचारिक नामांकन के बाद ही ‘उम्मीदवार’ बनता है; महज़ चुनाव लड़ने का इरादा जताने से नहीं।

  • मिथक: ‘निर्वाचन अधिकार’ का अर्थ केवल मत देने के अधिकार तक सीमित है।

    तथ्य: परिभाषा में न सिर्फ मतदान का कार्य शामिल है, बल्कि चुनाव लड़ने का अधिकार, उम्मीदवारी वापस लेने का अधिकार, और मतदान से विरत रहने का अधिकार भी समाहित है—यह केवल वोट डालने तक सीमित नहीं है।