Indian Penal Code, 1860
धारा 147
repealedPunishment for rioting
Whoever is guilty of rioting, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to two years, or with fine, or with both.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
1860 में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के अधीन भारतीय दंड संहिता (IPC) के प्रणेता समूह-आधारित हिंसा को, जो लोक व्यवस्था को खतरा पहुँचा सकती थी, रोकने के लिए एक विशिष्ट अपराध बनाना चाहते थे। धारा 146 ‘दंगा’ को ‘अवैध जमाव’ (पांच या अधिक व्यक्तियों का ऐसा समूह जिसका समान अवैध उद्देश्य हो) के सदस्यों द्वारा बल या हिंसा के प्रयोग के रूप में परिभाषित करती है, और धारा 147 इस अपराध के लिए दंड का प्रावधान करती है — जो मारपीट या हत्या जैसे उन व्यक्तिगत अपराधों से अलग है जो दंगे के दौरान घटित हो सकते हैं।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
भारतीय न्यायालयों ने लगातार माना है कि धारा 147 के तहत दोषसिद्धि के लिए यह सिद्ध होना चाहिए कि धारा 141 में परिभाषित एक अवैध जमाव अस्तित्व में था और धारा 146 के अनुसार उसके सदस्यों द्वारा वास्तव में बल या हिंसा का प्रयोग किया गया। न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि भीड़ में मात्र मौजूद होना पर्याप्त नहीं है — साझा सामान्य उद्देश्य और वास्तविक बल प्रयोग के प्रमाण होने चाहिए। धारा 147 के अंतर्गत सजा विवेकाधीन है, और न्यायालय अक्सर हिंसा की तीव्रता, हुई चोटें, तथा अभियुक्त की भूमिका को तौलकर केवल जुर्माना, कारावास, या दोनों में से उपयुक्त दंड निर्धारित करते हैं।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: दंगे के दौरान भीड़ में खड़ा कोई भी व्यक्ति धारा 147 के तहत जेल भेजा जा सकता है।
तथ्य: न्यायालयों ने माना है कि मात्र मौजूदगी पर्याप्त नहीं है — अवैध जमाव का हिस्सा होने का, समान उद्देश्य का, और वास्तविक बल या हिंसा के प्रयोग का प्रमाण होना चाहिए।
मिथक: धारा 147 दंगे के लिए दो वर्ष का अनिवार्य निश्चित कारावास तय करती है।
तथ्य: यह प्रावधान अधिकतम दो वर्ष तक की सीमा तय करता है; यह अनिवार्य सजा नहीं है — मामले के आधार पर न्यायाधीश कम अवधि की सजा, केवल जुर्माना, या दोनों दे सकते हैं।