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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 142

repealed

Being member of unlawful assembly

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

धारा 142, धारा 141 (जो ‘अवैध जमाव’ की परिभाषा देती है) के साथ मिलकर ऐसे व्यक्तियों पर उत्तरदायित्व तय करती है जो सार्वजनिक व्यवस्था के लिए ख़तरा पैदा करने वाली सामूहिक गतिविधि में भाग लेते हैं। भारतीय दंड संहिता के रचनाकारों ने अंग्रेज़ी समान्य विधि (English common law) में अवैध जमाव और उपद्रव से जुड़ी धारणाओं को ध्यान में रखते हुए यह सुनिश्चित किया कि लोग केवल “यूं ही मौजूद” होने का बहाना बनाकर दायित्व से न बच सकें। यह प्रावधान ज्ञान और अभिप्राय की मांग करता है; मात्र आकस्मिक उपस्थिति पर्याप्त नहीं है — यह सजग भागीदारी को लक्षित करता है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने निरंतर माना है कि धारा 142 के अंतर्गत सदस्यता के लिए जमाव के अवैध स्वरूप का ज्ञान तथा उसमें शामिल होने या बने रहने की सोची‑समझी इच्छा, दोनों आवश्यक हैं। न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि कोई व्यक्ति यदि पहले मासूमियत में जुड़ गया हो पर बाद में जब उसे जमाव के अवैध उद्देश्य का बोध हो जाए और वह तब भी रुक जाए, तो उसी समय से वह सदस्य माना जाएगा। निर्णयों ने यह भी रेखांकित किया है कि मात्र उपस्थिति, साझा जानकारी या इरादे के बिना, दायित्व नहीं खींचती — सच्चे दर्शकों को सक्रिय प्रतिभागियों से अलग किया जाता है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: सिर्फ़ किसी हिंसक हो चुकी भीड़ में मौजूद भर रहने से आप अपने‑आप दोषी हो जाते हैं।

    तथ्य: न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि दायित्व के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति को जमाव के अवैध होने का ज्ञान हो और उसमें शामिल रहने का जानबूझकर किया गया चुनाव हो — आकस्मिक या अनजान उपस्थिति पर्याप्त नहीं है।

  • मिथक: आपको अवैध जमाव का सदस्य माने जाने के लिए स्वयं कोई हिंसक कृत्य करना अनिवार्य है।

    तथ्य: धारा 142 में केवल जमाव में जानकार भागीदारी की शर्त है; सदस्य माने जाने के लिए व्यक्ति को अलग से व्यक्तिगत हिंसा करना आवश्यक नहीं है।