Indian Penal Code, 1860
धारा 115
repealedAbetment of offence punishable with death or imprisonment for life if offence not committed
Whoever abets the commission of an offence punishable with death or imprisonment for life, shall, if that offence be not committed in consequence of the abetment, and no express provision is made by this Code for the punishment of such abetment, be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to seven years, and shall also be liable to fine;
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
IPC की उकसाहट/सहायता संबंधी धाराएँ (धारा 107-120) उन लोगों को दंडित करने के लिए बनाई गई हैं जो अपराध के लिए उत्तेजित करते हैं, षड्यंत्र रचते हैं या परोक्ष रूप से ही सही, अपराध करने में मदद करते हैं। धारा 115 विशेष रूप से उन अत्यंत गंभीर अपराधों (जो मृत्यु-दंड या आजीवन कारावास से दंडनीय हैं) की उकसाहट के प्रयासों को निशाना बनाती है, जब योजना विफल हो जाए या अपराध घटित ही न हो। विधि-निर्माताओं का उद्देश्य ऐसे खतरनाक नियोजन और गंभीर अपराधों को बढ़ावा देने वाले व्यवहार को हतोत्साहित करना था, यह मानते हुए कि अपराध का न हो पाना मात्र इस बात को नहीं मिटाता कि उसे अंजाम दिलाने की कोशिश करने वाले की हरकत खतरनाक और दंडनीय थी।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यदि अपराध घटित न हो, तो उसे योजना बनाने या प्रोत्साहित करने वाले को कोई दंड नहीं मिलता।
तथ्य: धारा 115 विशेष रूप से गंभीर अपराधों की उकसाहट/सहायता (प्रोत्साहन, उत्तेजन या षड्यंत्र) को दंडित करती है, भले ही वह अपराध वास्तव में किया न गया हो; इसके तहत अधिकतम 7 वर्ष का कारावास और जुर्माने का प्रावधान है।
मिथक: धारा 115 किसी भी अपराध की उकसाहट/सहायता पर लागू होती है।
तथ्य: यह धारा केवल उन्हीं अपराधों की उकसाहट/सहायता पर लागू होती है जो मृत्यु-दंड या आजीवन कारावास से दंडनीय हैं, और केवल तब जब ऐसी उकसाहट/सहायता के लिए IPC की कोई अन्य विशिष्ट धारा पहले से दंड न तय करती हो।