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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 105

repealed

Commencement and continuance of the right of private defence of property

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

भारतीय दंड संहिता, 1860 — जो ब्रिटिश उपनिवेशकालीन प्रशासन के अधीन अंग्रेजी कॉमन लॉ (common law) के मजबूत प्रभाव में तैयार की गई — यह मानती है कि संपत्ति पर अचानक आए खतरे में लोग हमेशा पुलिस की मदद का इंतज़ार नहीं कर सकते। आईपीसी की धाराएँ 97 से 106 तक सामान्य नागरिकों को स्वयं तथा अपनी संपत्ति की रक्षा हेतु निजी प्रतिरक्षा का सीमित अधिकार देती हैं। धारा 105 विशेष रूप से संपत्ति के संबंध में इस अधिकार के आरंभ-बिंदु को निर्धारित करती है, ताकि केवल शंका के आधार पर पूर्व-आक्रमण को वैध ठहराने का दुरुपयोग न हो, और साथ ही वास्तविक खतरा आसन्न होने पर समय पर कार्रवाई संभव रहे।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने लगातार माना है कि ‘उचित आशंका’ एक वस्तुनिष्ठ कसौटी है — इसका आकलन अभियुक्त की स्थिति में एक समझदार व्यक्ति के दृष्टिकोण से किया जाएगा, न कि केवल अभियुक्त के निजी भय या बाद की समझ से। न्यायालय परिवेशी तथ्यों को देखते हैं, जैसे खतरे का स्वरूप, आक्रमणकर्ता का आचरण, और निकटवर्ती जोखिम, ताकि तय हो सके कि बचाव शुरू करते समय आशंका वास्तव में और तर्कसंगत रूप से मौजूद थी या नहीं। इस प्रावधान को धाराएँ 96 से 106 के साथ समग्र रूप में पढ़ा जाता है, क्योंकि निजी प्रतिरक्षा अधिकार अलग-थलग नहीं हैं, बल्कि एक परस्पर जुड़े ढाँचे का हिस्सा हैं।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: आप केवल घबराहट या संदेह मात्र होते ही इस अधिकार का उपयोग नहीं कर सकते।

    तथ्य: अदालतें मांग करती हैं कि आशंका ‘उचित’ हो — यानी स्थिति का वस्तुनिष्ठ और समझदार आकलन आधारित हो, केवल व्यक्तिगत भय या कल्पना पर नहीं।

  • मिथक: यह अधिकार आपको तब भी किसी पर हमला करने की छूट नहीं देता जब तक आपकी संपत्ति के प्रति कोई वास्तविक धमकीपूर्ण आचरण शुरू ही न हुआ हो।

    तथ्य: यह अधिकार तभी शुरू होता है जब वास्तविक, धमकीपूर्ण परिस्थितियाँ संपत्ति के प्रति तर्कसंगत खतरा उत्पन्न करें — उससे पहले नहीं।