Indian Penal Code, 1860
धारा 104
repealedWhen such right to causing any harm other than death
If the offence, the committing of which, or the attempting to commit which occasions the exercise of the right of private defence, be theft, mischief, or criminal trespass, not of any of the descriptions enumerated in the last preceding section, that right does not extend to the voluntary causing of death, but does extend, subject to the restrictions mentioned in section 99, to the voluntary causing to the wrong-doer of any harm other than death.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
मैकॉले के अधीन पहली विधि आयोग द्वारा तैयार और 1860 में अधिनियमित भारतीय दंड संहिता इस बात का संतुलन बनाने का प्रयास करती है कि व्यक्ति को संपत्ति की रक्षा का अधिकार है, पर मानव जीवन का भी मूल्य है। धारा 103 और 104 एक जोड़ी के रूप में काम करती हैं: धारा 103 में गंभीर संपत्ति अपराध (जैसे डकैती, रात्रि में घर में घुसना, आगज़नी, मृत्यु के भय से की गई चोरी) सूचीबद्ध हैं, जहाँ अपराधी की हत्या औचित्यपूर्ण हो सकती है। धारा 104 शेष, कम गंभीर संपत्ति अपराधों—साधारण चोरी, मिसचीफ या अतिक्रमण—को कवर करती है, जहाँ कानून कहता है कि केवल संपत्ति के लिए जीवन लेना उचित नहीं, इसलिए केवल गैर-घातक प्रतिरक्षा बल की अनुमति है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
भारतीय न्यायालयों ने निरंतर माना है कि धारा 104 एक स्पष्ट रेखा खींचती है: छोटे-मोटे अपराधों से संपत्ति की रक्षा हेतु प्रयोग किया गया बल मृत्यु से कम पर ही रुकना चाहिए। निर्णयों ने रेखांकित किया है कि अभियुक्त को दिखाना होगा कि अपराध साधारण चोरी, मिसचीफ या अतिक्रमण का था (धारा 103 की उग्र सूची में नहीं) ताकि यह निम्नतर सीमा लागू हो; और यह भी कि ‘मृत्यु के अतिरिक्त हानि’ की अनुमति भी धारा 99 की आवश्यकता एवं समानुपात (प्रोपोर्शनैलिटी) जैसी सीमाओं का सम्मान करे, जैसे खतरे को रोकने के लिए जितना आवश्यक है उससे अधिक न होना।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: आप अपनी संपत्ति पर चोरी या अतिक्रमण करते किसी को भी मार सकते हैं।
तथ्य: धारा 104 विशेष रूप से कहती है कि साधारण चोरी, मिसचीफ या अतिक्रमण के मामलों में निजी प्रतिरक्षा का अधिकार मृत्यु कारित करने तक विस्तृत नहीं होता—केवल अन्य प्रकार की हानि पहुँचाने तक ही।
मिथक: एक बार यह धारा लागू हो जाए, तो आप अपराधी को दंड देने के लिए असीमित बल प्रयोग कर सकते हैं।
तथ्य: पहुँचाई गई हानि फिर भी धारा 99 की सीमाओं में रहनी चाहिए, अर्थात अपराध रोकने के लिए वह आवश्यक और समानुपाती हो—बदले या अति का कार्य नहीं।