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सं Samvidhan

Judiciary & appointments

Supreme Court Advocates-on-Record Association v. Union of India (Second Judges Case)

Supreme Court of India · 1993 · AIR 1994 SC 268; (1993) 4 SCC 441

सत्यापन प्रतीक्षित

इस मामले ने यह तय किया कि भारत के उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति पर वास्तविक नियंत्रण किसका होगा—सरकार का या स्वयं न्यायपालिका का। सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि वरिष्ठ न्यायाधीश, जो मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व में एक ‘कोलेजियम’ (Collegium) के रूप में सामूहिक रूप से कार्य करते हैं, न्यायाधीशों के चयन पर अंतिम निर्णय लें, न कि कार्यपालिका सरकार। इससे न्यायिक नियुक्तियों को प्रभावी रूप से राजनीतिक हस्तक्षेप से सुरक्षित कर दिया गया, जिससे आम नागरिकों का यह विश्वास बढ़ा कि न्यायाधीशों का चयन योग्यता और न्यायिक सहमति के आधार पर होता है, न कि राजनीतिक कृपा से। इस निर्णय ने उस कोलेजियम प्रणाली की स्थापना की जो आज भी भारत में न्यायिक नियुक्तियों को संचालित करती है।

कहानी

तथ्य

सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन ने एक रिट याचिका दायर की, जिसमें उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका की प्रधान भूमिका को चुनौती दी गई, जिसे पहले के S.P. Gupta v. Union of India (First Judges Case, 1981) द्वारा अनुमोदित किया गया था। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि केंद्र सरकार द्वारा न्यायिक नियुक्तियों पर प्रधानता का प्रयोग करना, और भारत के मुख्य न्यायाधीश की राय को मात्र परामर्शात्मक मानना, न्यायिक स्वतंत्रता को कमजोर करता है। फर्स्ट जजेज़ केस की शुद्धता पर पुनर्विचार करने के लिए नौ-न्यायाधीशों की एक पीठ का गठन किया गया।

न्यायालय के समक्ष प्रश्न

न्यायाधीशों की नियुक्ति में संविधान के Article 124(2) और 217(1) के अंतर्गत भारत के मुख्य न्यायाधीश के साथ ‘परामर्श’ का वास्तविक अर्थ क्या है, और क्या यह परामर्श कार्यपालिका को प्रधानता देता है या न्यायपालिका को?

न्यायिक निर्णय

7:2 के बहुमत से, सर्वोच्च न्यायालय ने फर्स्ट जजेस केस को पलट दिया और यह माना कि अनुच्छेद 124 तथा 217 के अंतर्गत ‘परामर्श’ का वास्तविक अर्थ भारत के प्रधान न्यायाधीश (Chief Justice of India) की ‘सम्मति’ है, जो उनके वरिष्ठतम सहकर्मियों के एक कोलेजियम से परामर्श के बाद निर्मित होती है। न्यायालय ने कहा कि न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण के मामलों में, बहुलता वाले न्यायाधीशों (कोलेजियम) से समुचित परामर्श के उपरांत दी गई प्रधान न्यायाधीश की राय को कार्यपालिका के दृष्टिकोण पर प्रधानता मिलनी चाहिए, क्योंकि कार्यपालिका की भूमिका स्वतंत्र चयन शक्ति के प्रयोग के बजाय मुख्यतः कोलेजियम की संस्तुतियों के परीक्षण-परिशोधन तक सीमित कर दी गई थी। इससे न्यायिक नियुक्तियों के लिए जिस व्यवस्था को कोलेजियम प्रणाली कहा जाने लगा, वह स्थापित हो गई।

यह जिस सिद्धांत का समर्थन करता है

न्यायिक स्वतंत्रता, जो संविधान की एक आधारभूत विशेषता है, की रक्षा के लिए न्यायाधीशों की नियुक्ति में न्यायपालिका की प्रधानता होना आवश्यक है; अनुच्छेद 124 और 217 के अंतर्गत मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India) से ‘परामर्श’ केवल औपचारिकता नहीं है, बल्कि वरिष्ठ न्यायाधीशों के कोलेजियम द्वारा सामूहिक रूप से बनी प्रभावी सहमति की अपेक्षा करता है। कार्यपालिका इस कोलेजियम की सर्वसम्मत अनुशंसा को सशक्त और ठोस कारणों वाले विरल मामलों को छोड़कर निरस्त नहीं कर सकती और न ही उसके विपरीत कार्य कर सकती है, और तब भी यह कुछ सुरक्षा-उपायों के अधीन रहेगा।

प्रावधान जिनपर इस मामले का प्रभाव पड़ा

सार्वजनिक अभिलेखों से AI-सहायता प्राप्त सारांश। पूर्ण निर्णय पढ़ें: Indian Kanoon.