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सं Samvidhan

Criminal justice & police powers

Prakash Singh v. Union of India

Supreme Court of India · 2006 · (2006) 8 SCC 1

सत्यापन प्रतीक्षित

इस मामले ने भारतीय सरकारों को पुलिस बलों के संचालन के तरीके में सुधार करने के लिए बाध्य किया, जिसका उद्देश्य यह था कि राजनेता पुलिस का व्यक्तिगत या दलगत हितों के लिए दुरुपयोग न कर सकें। इसने राज्य सुरक्षा आयोगों और पुलिस शिकायत प्राधिकरणों जैसी नई संस्थाओं की रचना की, ताकि पुलिस शासक राजनेताओं के बजाय नागरिकों के प्रति अधिक स्वतंत्र और जवाबदेह हो। यद्यपि क्रियान्वयन राज्यों में धीमा और असमान रहा है, यह निर्णय भारत में पुलिस सुधार का आधारभूत खाका बना हुआ है। साधारण नागरिकों के लिए, यह इस आश्वासन का प्रतीक था कि पुलिस अपराधों की निष्पक्ष जाँच करेगी और प्रभावशाली व्यक्तियों की रक्षा के लिए पुलिसकर्मियों का मनमाने ढंग से तबादला या दुरुपयोग नहीं किया जा सकेगा।

कहानी

तथ्य

प्रकाश सिंह, जो पूर्व पुलिस महानिदेशक थे, ने 1996 में एक जनहित याचिका दायर की जिसमें पुलिस प्रशासन में व्यापक राजनीतिक हस्तक्षेप, अधिकारियों के मनमाने तबादले, और भारतीय पुलिस बलों में जवाबदेही तंत्र की कमी को रेखांकित किया गया। याचिका ने स्वतंत्र भारत में पुलिसिंग के लिए औपनिवेशिक दौर के Police Act of 1861 के निरंतर उपयोग को शासक ढांचे के रूप में चुनौती दी। इसमें न्यायिक निर्देशों की मांग की गई, ताकि केंद्र और राज्य सरकारों को 1970 के दशक से विभिन्न विशेषज्ञ आयोगों द्वारा की गई लम्बे समय से लंबित पुलिस सुधार सिफारिशों को लागू करने के लिए बाध्य किया जा सके।

न्यायालय के समक्ष प्रश्न

यह प्रश्न कि विधायी कार्रवाई के अभाव में न्यायपालिका क्या संघ और राज्य सरकारों को बाध्यकारी निदेश दे सकती है और देना चाहिए, ताकि पुलिस प्रशासन में सुधार हो, पुलिस को मनमाने राजनीतिक नियंत्रण से अलग रखा जा सके, और कार्यात्मक स्वायत्तता व जवाबदेही सुनिश्चित हो।

न्यायिक निर्णय

उच्चतम न्यायालय ने माना कि विधि के शासन को सुरक्षित करने के लिए पुलिस सुधार अनिवार्य है और यह निर्देश दिया कि उपयुक्त विधेयक पारित होने तक सभी राज्य सरकारें और केंद्र शासित प्रदेश सात बाध्यकारी निदेशों का पालन करें: नीति-निर्देश तय करने और अवांछित राजनीतिक हस्तक्षेप को रोकने के लिए राज्य सुरक्षा आयोग की स्थापना; पुलिस महानिदेशक तथा परिचालन कर्तव्यों पर कार्यरत अन्य प्रमुख अधिकारियों के लिए न्यूनतम दो वर्ष का कार्यकाल; अन्वेषण (जांच) तथा कानून-व्यवस्था के कार्यों का पृथक्करण; तबादले, पदस्थापन और पदोन्नति का निर्णय करने के लिए पुलिस स्थापना बोर्ड की स्थापना; कदाचार की जांच हेतु राज्य और जिला स्तर पर पुलिस शिकायत प्राधिकरणों का सृजन; केन्द्रीय पुलिस बलों के प्रमुखों के चयन के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग की स्थापना; तथा अन्वेषण क्षमता में सुधार के लिए अन्वेषण करने वाली पुलिस को कानून-व्यवस्था संभालने वाली पुलिस से अलग करना।

यह जिस सिद्धांत का समर्थन करता है

न्यायालय ने माना कि संविधान के अंतर्गत पुलिस भले ही राज्य विषय हो, फिर भी उसका संगठन इस प्रकार होना चाहिए कि वह मनमाने राजनीतिक तथा कार्यपालिका के हस्तक्षेप से मुक्त रहे, क्योंकि संरक्षित और जवाबदेह पुलिसिंग क़ानून के शासन तथा मूल अधिकारों की रक्षा के लिए अनिवार्य है। दशकों से बार‑बार विशेषज्ञ सिफ़ारिशों के बावजूद विधायी सुधार न होने की स्थिति में, संवैधानिक न्यायालय लोकहित संस्थाओं में संरचनात्मक जवाबदेही तंत्र लागू कराने हेतु अनुच्छेद 32 और 142 के अंतर्गत बाध्यकारी निर्देश जारी कर सकते हैं।

प्रावधान जिनपर इस मामले का प्रभाव पड़ा

सार्वजनिक अभिलेखों से AI-सहायता प्राप्त सारांश। पूर्ण निर्णय पढ़ें: Indian Kanoon.