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सं Samvidhan

Criminal justice & police powers

K.M. Nanavati v. State of Maharashtra

Supreme Court of India · 1961 · 1962 AIR 605, (1962) Supp 1 SCR 567

सत्यापन प्रतीक्षित

इस मामले ने यह मानक स्थापित किया कि भारत में आवेग की तीव्रता में किसी की हत्या करने के आरोपित व्यक्ति कब हत्या की तुलना में कम गंभीर आरोप का दावा कर सकता है—यह दर्शाते हुए कि न्यायालय गहराई से परखेंगे कि क्या वास्तव में सोचने का समय बिल्कुल नहीं था, या क्या अभियुक्त के पास शांत होकर योजना बनाने का समय था। इसने यह भी स्पष्ट किया कि किसी राज्य का राज्यपाल अपनी क्षमादान संबंधी शक्तियों का उपयोग करके ऐसे न्यायिक मामले में हस्तक्षेप नहीं कर सकता जो अभी लंबित हो। यह मामला मीडिया में सनसनी बन गया और भारतीय विधि में ‘आवेगजन्य अपराध’ (crime of passion) नामक प्रतिरक्षा के सार्वजनिक तथा विधिक समझ को आकार दिया, यह स्पष्ट करते हुए कि ऐसी प्रतिरक्षाओं की कड़ी सीमाएँ हैं।

कहानी

तथ्य

के. एम. नानावटी, एक नौसेना कमांडर, ने प्रेम आहूजा को गोली मारकर हत्या कर दी, जिनके साथ उनकी पत्नी सिल्विया का संबंध था, उनके फ्लैट पर सामना करने के बाद। नानावटी का दावा था कि उनकी पत्नी के अचानक किए गए स्वीकारोक्ति के बाद हुई हाथापाई के दौरान गोली दुर्घटनावश चल गई, और उन्होंने ‘गंभीर व आकस्मिक उकसावे’ (grave and sudden provocation) के प्रतिरक्षा-आधार का सहारा लिया ताकि हत्या के आरोप को घटाकर गैर-हत्या-समान दोषिता वाली आपराधिक मानवहत्या (culpable homicide not amounting to murder) कर दिया जाए। बॉम्बे उच्च न्यायालय ने ज्यूरी द्वारा दिए गए बरी किए जाने के निर्णय को निरस्त करने के बाद उन्हें हत्या का दोषी ठहराया; उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में अपील की। इस मामले ने यह प्रश्न भी उठाया कि मामला न्यायालय के विचाराधीन रहते हुए (sub judice) बॉम्बे के राज्यपाल द्वारा अनुच्छेद 161 के अंतर्गत क्षमादान शक्ति के प्रयोग की वैधता क्या है।

न्यायालय के समक्ष प्रश्न

क्या हत्या, उकसावे और कृत्य के बीच के समय-अंतराल को ध्यान में रखते हुए, भारतीय दंड संहिता की धारा 300 के अपवाद 1 (गंभीर और आकस्मिक उकसावा) के दायरे में आती थी, और क्या राज्यपाल, जब उच्च न्यायालय में अपील लंबित थी, अनुच्छेद 161 के तहत विधिवत रूप से दंड का निलंबन कर सकते थे।

न्यायिक निर्णय

सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 302 भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत हत्या के लिए नानावटी के दोषसिद्धि को बरकरार रखा, यह कहते हुए कि धारा 300 के अपवाद 1 के अंतर्गत ‘गंभीर और आकस्मिक उत्तेजना’ का बचाव उपलब्ध नहीं था, क्योंकि कथित उत्तेजना (उसकी पत्नी का स्वीकार) और हत्या के बीच पर्याप्त समय बीत चुका था—जिस दौरान नानावटी ने अपने बच्चों को एक सिनेमा में छोड़ा, अपने जहाज़ तक गाड़ी चलाई, एक रिवॉल्वर प्राप्त किया, और अहूजा के फ्लैट तक गाड़ी चलाई—ताकि वह आत्म-नियंत्रण पुनः प्राप्त कर सके; अतः उत्तेजना न तो ‘आकस्मिक’ थी और न ही उसने उसे शांतिपूर्वक विचार करने का अवसर छीन लिया था। न्यायालय ने आगे यह भी माना कि जब मामला उच्च न्यायालय में अपील पर लंबित था तब राज्यपाल द्वारा अनुच्छेद 161 के तहत दंडादेश को निलंबित करने की शक्ति का प्रयोग अनुचित था, क्योंकि इससे न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप हुआ और मामला उप न्यायालय (sub judice) था।

यह जिस सिद्धांत का समर्थन करता है

भारतीय दंड संहिता की धारा 300 के अपवाद 1 के अंतर्गत गंभीर और आकस्मिक उकसावे के बचाव के सफल होने के लिए आवश्यक है कि अभियुक्त का आत्मसंयम का ह्रास वास्तविक हो, और उकसावे के तुरंत बाद बिना ऐसे युक्तिसंगत अंतराल के कार्य किया गया हो जो पूर्व-चिंतन या शांति होने (कूलिंग ऑफ) का अवसर देता; विचार-विमर्श की अवधि के उपरांत किया गया सोचा-समझा, सुनियोजित कृत्य इस बचाव को निष्फल कर देता है। साथ ही, अनुच्छेद 161 के अंतर्गत दया/दंड स्थगन (pardon/suspension of sentence) की कार्यपालिका शक्ति लंबित न्यायिक कार्यवाहियों में हस्तक्षेप करने के लिए प्रयुक्त नहीं की जा सकती।

प्रावधान जिनपर इस मामले का प्रभाव पड़ा

सार्वजनिक अभिलेखों से AI-सहायता प्राप्त सारांश। पूर्ण निर्णय पढ़ें: Indian Kanoon.