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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 53

Facts admitted need not be proved

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

न्यायालयों का उद्देश्य विवादों का कुशल निपटारा करना है, और जिन तथ्यों पर पहले ही सहमति है, उन्हें फिर से सिद्ध कराने से समय व संसाधन व्यर्थ होते हैं। यह नियम पुराने Indian Evidence Act, 1872 (Section 58) से ग्रहण किया गया है, जिससे न्यायालय वास्तविक रूप से विवादित मुद्दों पर ध्यान केंद्रित कर सकें। यह अधिकांश विधि-प्रणालियों में पाए जाने वाले व्यावहारिक, सामान्य-बुद्धि के सिद्धांत को दर्शाता है: निर्विवाद तथ्यों पर अलग से मुकदमा चलाने की जरूरत नहीं।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

पूर्व के समान प्रावधान (Evidence Act का Section 58) के अंतर्गत भारतीय न्यायालयों ने लगातार माना कि दावों/प्लीडिंग्स, लिखित कथनों या सुनवाई के दौरान किए गए स्वीकृतियां (admissions) पक्षकारों पर बाध्यकारी होती हैं और बिना अतिरिक्त साक्ष्य के भी निर्णय का आधार बन सकती हैं। हालांकि, न्यायालयों ने उपबंध (proviso) का उपयोग करते हुए संवेदनशील विषयों—जैसे आपराधिक मामलों, वैवाहिक विवादों, या जहां जनहित अथवा तृतीय पक्ष के अधिकार प्रभावित हों—में स्वतंत्र प्रमाण की मांग भी की है, क्योंकि पक्षकार ऐसे तथ्यों को ‘स्वीकृति’ देकर नहीं टाल सकते जो अन्य व्यक्तियों या राज्य को प्रभावित करते हों।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: एक बार दोनों पक्ष किसी तथ्य पर सहमत हो जाएं, तो न्यायालय को बिना किसी प्रश्न के उसे अवश्य स्वीकार करना होता है।

    तथ्य: उपबंध (proviso) न्यायालय को यह विवेक देता है कि स्वीकृति हो जाने के बाद भी, विशेषकर संवेदनशील या उच्च-दांव के मामलों में, वह स्वतंत्र प्रमाण की मांग कर सके।

  • मिथक: यह धारा केवल उन लिखित समझौतों पर लागू होती है जिन्हें सुनवाई से पहले हस्ताक्षरित किया गया हो।

    तथ्य: यह सुनवाई के दौरान की गई मौखिक स्वीकृतियों पर भी लागू होती है, केवल लिखित समझौतों तक सीमित नहीं।