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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 2

Definitions

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह धारा पुराने Indian Evidence Act, 1872 की धारा 3 का स्थान लेती है और 150 वर्ष पुरानी परिभाषाओं को डिजिटल युग के अनुरूप अद्यतन करती है। 2023 के अधिनियम का उद्देश्य भारत के साक्ष्य क़ानून को आधुनिक बनाना है, और इसकी सबसे स्पष्ट प्रगतियों में से एक है ‘दस्तावेज’ और ‘साक्ष्य’ की परिभाषाओं में इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल अभिलेखों को सुस्पष्ट रूप से लिख देना—जिसे न्यायालय पहले ही व्याख्या और न्यायनिर्णयों के माध्यम से मानते आए थे (जैसे ईमेल, व्हाट्सऐप चैट या CCTV फ़ुटेज को दस्तावेज मानना) विशेषकर IT Act 2000 के संशोधनों के बाद। साझा स्पष्ट परिभाषाएँ बुनियादी शब्दावली पर विवादों को रोकती हैं और अधिनियम के अन्य सभी प्रावधानों को पूर्वानुमेय ढंग से चलने देती हैं।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

पुराने 1872 के अधिनियम के तहत, न्यायालयों ने ‘दस्तावेज’ और ‘साक्ष्य’ के अर्थ का क्रमशः विस्तार करते हुए टेप-रिकॉर्डिंग, फ़ोटोग्राफ़ और बाद में इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों को भी शामिल किया, खासकर IT Act 2000 में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के लिए धारा 65B आने के बाद। Anvar P.V. v. P.K. Basheer (2014) और Arjun Panditrao Khotkar v. Kailash Kushanrao Gorantyal (2020) जैसे महत्वपूर्ण निर्णयों ने इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों के सिद्ध और प्रमाणीकरण के तरीके पर व्यापक मार्गदर्शन दिया। 2023 का अधिनियम इसी न्यायिक इतिहास पर आगे बढ़ते हुए ‘इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल अभिलेख’ को सीधे परिभाषाओं में लिख देता है, ताकि यह विवाद कि ऐसे अभिलेख ‘दस्तावेज’ या ‘साक्ष्य’ हैं या नहीं, व्याख्या पर न छोड़कर स्वयं विधि-पाठ से ही सुलझ जाए।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: सिर्फ काग़ज़ पर लिखा लेखन ही न्यायालय में ‘दस्तावेज’ माना जाता है।

    तथ्य: परिभाषा ईमेल, टेक्स्ट और वॉइसमेल जैसे इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल अभिलेखों को स्पष्ट रूप से दस्तावेज के रूप में शामिल करती है।

  • मिथक: ‘मान सकते हैं’ (may presume) और ‘मान लिया जाएगा’ (shall presume) का एक ही अर्थ है।

    तथ्य: ‘मान सकते हैं’ न्यायालय को यह विवेक देता है कि वह तथ्य को सिद्ध मान ले या पहले और प्रमाण मांगे; जबकि ‘मान लिया जाएगा’ में न्यायालय को तथ्य को तब तक सिद्ध मानना अनिवार्य है जब तक वह असिद्ध न कर दिया जाए।

  • मिथक: इस क़ानून के तहत पंच/पंचनिर्णायक (अरबिट्रेटर) ‘न्यायालय’ माने जाते हैं।

    तथ्य: ‘न्यायालय’ की परिभाषा विशेष रूप से पंच/पंचनिर्णायकों (अरबिट्रेटर्स) को बाहर रखती है, यद्यपि पंच भी साक्ष्य लेते हैं।