Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023
धारा 60
Discharge of person apprehended
No person who has been arrested by a police officer shall be discharged except on his bond, or bail bond, or under the special order of a Magistrate.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह प्रावधान भारतीय दंड प्रक्रिया कानून के पूर्ववर्ती नियम (पुराने दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 59) की निरंतरता है। इसका उद्देश्य यह है कि पुलिस द्वारा गिरफ्तार व्यक्तियों की मनमानी या अनौपचारिक रिहाई न हो, बल्कि हमेशा एक दर्ज और जवाबदेह प्रक्रिया रहे—या तो बंधपत्र/जमानत-बॉन्ड की प्रणाली के माध्यम से या न्यायिक पर्यवेक्षण के तहत—ताकि किसी को हिरासत से छोड़े जाने से पहले रिकॉर्ड बने। इससे जाँच की निष्पक्षता तथा अभियुक्त के अधिकार दोनों सुरक्षित रहते हैं, काग़ज़ी प्रमाण-श्रृंखला बनती है और पुलिस के विवेक पर नियंत्रण रहता है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
अदालतों ने सामान्यतः इस प्रावधान को इस रूप में पढ़ा है कि पुलिस हिरासत से रिहाई औपचारिक और अभिलेखित होनी चाहिए, न कि मनमानी या अनौपचारिक। ज़मानत और रिमांड (संबंधित दंड प्रक्रिया संहिता प्रावधान की व्याख्या करते हुए) पर दिए गए न्यायिक निर्णयों ने रेखांकित किया है कि बंधपत्र/जमानत-बॉन्ड की प्रक्रिया अपनाए बिना या मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना पुलिस किसी गिरफ्तार व्यक्ति को रिहा नहीं कर सकती, जिससे यह प्रावधान विधि में व्यापक ज़मानत और रिमांड ढाँचे से घनिष्ठ रूप से जुड़ जाता है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: पुलिस यदि मामला मामूली लगे तो गिरफ्तार व्यक्ति को अनौपचारिक रूप से छोड़ सकती है।
तथ्य: क़ानून यह मांग करता है कि किसी भी गिरफ्तार व्यक्ति की रिहाई से पहले औपचारिक बंधपत्र, जमानत-बॉन्ड, या मजिस्ट्रेट का विशेष आदेश हो—सिर्फ पुलिस द्वारा अनौपचारिक रिहाई मान्य नहीं है।
मिथक: केवल मजिस्ट्रेट ही किसी गिरफ्तार व्यक्ति को रिहा कर सकता है।
तथ्य: रिहाई पुलिस थाने पर ही बंधपत्र या जमानत-बॉन्ड की व्यवस्था करके भी हो सकती है; ऐसे में मजिस्ट्रेट के पास जाने की आवश्यकता नहीं होती, जब तक कि प्रकरण की विशिष्ट परिस्थितियाँ इसकी मांग न करें।