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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 59

Police to report apprehensions

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान एक पुराने नियम (पूर्व में आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 58) को आगे बढ़ाता है, जिसका उद्देश्य मजिस्ट्रेटों को अपने अधिकार क्षेत्र में होने वाली गिरफ़्तारियों, खासकर बिना वारंट की गिरफ़्तारियों—जहाँ पहले से कोई न्यायिक जाँच नहीं होती—पर नज़र रखने देना है। क्योंकि बिना वारंट गिरफ़्तारी केवल पुलिस के विवेक पर आधारित होती है, इसलिए मजिस्ट्रेट को रिपोर्ट भेजना पर्यवेक्षण की एक परत और अभिलेख तैयार करता है, जिससे मनमानी गिरफ़्तारियों पर अंकुश रहता है और मजिस्ट्रेटों को यह जानकारी रहती है कि कौन हिरासत में है या किसे ज़मानत मिल चुकी है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह धारा हर गिरफ़्तारी से पहले मजिस्ट्रेट की स्वीकृति अनिवार्य करती है।

    तथ्य: यह केवल बिना वारंट गिरफ़्तारी के बाद रिपोर्ट भेजने की मांग करती है, पहले से अनुमति नहीं। गिरफ़्तारी स्वयं पुलिस की शक्तियों के आधार पर हो सकती है; मजिस्ट्रेट को बाद में अवगत कराया जाता है।

  • मिथक: यह रिपोर्टिंग दायित्व सभी गिरफ़्तारियों पर लागू होता है, जिनमें वारंट के साथ की गई गिरफ़्तारियाँ भी शामिल हैं।

    तथ्य: यह प्रावधान विशेष रूप से बिना वारंट की गई गिरफ़्तारियों को कवर करता है, क्योंकि उनमें पहले से मजिस्ट्रेट का आदेश शामिल नहीं होता।