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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 430

Suspension of sentence pending appeal; release of appellant on bail

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

आपराधिक अपीलों के निस्तारण में अक्सर लंबा समय लग सकता है; यदि यह प्रावधान न हो, तो कोई दोषसिद्ध व्यक्ति वर्षों जेल में बिता सकता है, जबकि बाद में अपीलीय न्यायालय उसकी सज़ा पलट दे या घटा दे—अर्थात वह ऐसी सज़ा भुगत ले जो अंततः टिकी ही नहीं। यह धारा सार्वजनिक सुरक्षा और मूल दोषसिद्धि की गंभीरता के साथ उस चिंता का संतुलन बनाती है, न्यायालयों को अपील लंबित रहने के दौरान सज़ा निलंबित करने और जमानत देने का विवेकाधिकार देती है, तथा अत्यंत गंभीर अपराधों में अतिरिक्त सावधानी के रूप में अभियोजन को आपत्ति का अवसर देती है। यह CrPC, 1973 की धारा 389 की परंपरा को जारी रखती है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

न्यायालयों, जिनमें सर्वोच्च न्यायालय भी शामिल है, ने बार-बार रेखांकित किया है कि जहाँ अपील के शीघ्र सुने-निर्णीत होने की संभावना कम हो, वहाँ अपील लंबित रहने के दौरान सज़ा का निलंबन और जमानत देना अपवाद नहीं बल्कि साधारण नियम होना चाहिए, विशेषकर कुछ वर्षों की सज़ाओं में; ताकि व्यक्ति अपना अधिकांश या पूरा दंड अपील के निर्णय से पहले ही न भुगत ले—यह सिद्धांत Kashmira Singh v. State of Punjab (1977) में प्रसिद्ध रूप से प्रतिपादित किया गया, जिसमें कहा गया कि किसी व्यक्ति को उतनी अवधि से प्रभावी रूप से अधिक समय तक जेल में नहीं रखा जाना चाहिए जितना अंततः अपील के समुचित निपटारे पर उचित ठहर सकता है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: दोषसिद्धि का अर्थ हमेशा यही नहीं है कि अपील के पूर्ण निर्णय तक जेल में ही रहना पड़े।

    तथ्य: न्यायालय अपील लंबित रहने के दौरान सज़ा निलंबित कर सकते हैं और जमानत दे सकते हैं, तथा विशेषकर तब ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित किए जाते हैं जब अपील की शीघ्र सुनवाई की संभावना कम हो।