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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 27

Powers of officers appointed

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान भारतीय दंड प्रक्रिया की एक दीर्घकालिक विशेषता (मूलतः दंड प्रक्रिया संहिता में) को आगे बढ़ाता है, जिसका उद्देश्य प्रशासनिक देरी और व्यवधान से बचना है। मजिस्ट्रेट और पुलिस अधिकारी एक ही राज्य के भीतर अक्सर स्थानांतरित या पदोन्नत होते रहते हैं। ऐसे नियम के बिना, हर स्थानांतरण या पदोन्नति पर विशेष अधिकारों के पुनः-आवंटन हेतु नया कागज़ी काम करना पड़ता, जिससे कानून-व्यवस्था और आपराधिक न्याय प्रशासन में खलल पड़ता। यह धारा अधिकार की निरंतरता सुनिश्चित करती है ताकि सामान्य प्रशासनिक फेरबदल के कारण न्याय वितरण ठप्प न पड़े।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

अदालतों ने ऐतिहासिक रूप से दंप्रसं (CrPC) के समकक्ष प्रावधान (पुरानी संहिता की धारा 15) को नये मौलिक अधिकार प्रदान करने के बजाय एक व्यावहारिक, प्रशासनिक निरंतरता का नियम माना है। न्यायिक निर्णयों ने रेखांकित किया है कि स्वचालित निरंतरता के लिए अधिकारी का नया पद सच में ‘समान या उच्चतर’ तथा ‘उसी प्रकृति’ का होना चाहिए, और नया स्थानीय क्षेत्र पहले वाले के ‘समान प्रकार’ का होना चाहिए। अदालतों ने यह भी स्वीकार किया है कि सरकार या उच्च न्यायालय स्पष्ट आदेश देकर इस डिफ़ॉल्ट नियम को निरस्त कर सकते हैं, और जब निर्देश स्पष्ट रहे हैं, उन्हें प्रभावी माना गया है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: अधिकारी को भारत में कहीं भी स्थानांतरण होते ही हर बार अपने-आप नए अधिकार मिल जाते हैं।

    तथ्य: यह निरंतरता केवल उसी राज्य सरकार के अधिकार-क्षेत्र के भीतर और ‘समान प्रकार के स्थानीय क्षेत्र’ तक सीमित है—यह विभिन्न राज्यों के बीच अपने-आप लागू नहीं होती।

  • मिथक: एक बार दिए गए ये विशेष अधिकार कभी वापस नहीं लिए जा सकते।

    तथ्य: उच्च न्यायालय या राज्य सरकार कभी भी—स्थानांतरण से पहले या बाद में—स्पष्ट निर्देश देकर इन अधिकारों की स्वचालित निरंतरता रोक सकते हैं।