Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023
धारा 172
Persons bound to conform to lawful directions of police
(1) All persons shall be bound to conform to the lawful directions of a police officer given in fulfilment of any of his duty under this Chapter.
(2) A police officer may detain or remove any person resisting, refusing, ignoring or disregarding to conform to any direction given by him under sub-section (1) and may either take such person before a Magistrate or, in petty cases, release him as soon as possible within a period of twenty-four hours.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह प्रावधान पुरानी दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 65 की निरन्तरता है। इसका उद्देश्य यह है कि उसी अध्याय में स्वीकृत गिरफ़्तारी-संबंधी शक्तियों को व्यावहारिक रूप से लागू कराने हेतु पुलिस को प्रभावी अधिकार मिले — जैसे गिरफ़्तारी के दौरान राहगीरों को दिशा-निर्देश देना, भीड़ को नियंत्रित करना, या स्थल की सुरक्षा करना। यदि बैकअप प्रवर्तन-तंत्र न हो, तो वैध निर्देशों की अनदेखी की जा सकती है और गिरफ़्तारी की प्रक्रिया निष्फल हो जाएगी। साथ ही, कानून इस शक्ति पर सीमाएँ लगाता है: निर्देश ‘वैध’ होना चाहिए और उसी अध्याय के किसी कर्तव्य से सम्बद्ध होना चाहिए; और अनुपालन न होने पर निरुद्ध करने की अवधि 24 घंटे तक सीमित है जब तक कि व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत न किया जाए।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: गलत: पुलिस किसी को भी कुछ भी करने का हुक्म दे सकती है और सबको हर हाल में मानना पड़ेगा।
तथ्य: यह धारा केवल ‘वैध’ निर्देशों पर लागू होती है जो उसी अध्याय में उल्लिखित कर्तव्य का निर्वहन करते समय दिए गए हों (मुख्यतः गिरफ़्तारी-सम्बंधी कर्तव्य) — न कि किसी भी विषय पर दिया गया कोई भी आदेश।
मिथक: गलत: इस धारा के तहत एक बार निरुद्ध होने पर व्यक्ति को अनिश्चितकाल तक रोका जा सकता है।
तथ्य: क़ानून यह मांग करता है कि अधिकारी या तो उस व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करे या तुच्छ मामलों में 24 घंटे के भीतर उसे छोड़ दे।