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सं Samvidhan

Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023

धारा 90

Death caused by act done with intent to cause miscarriage

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान पुराने भारतीय दंड संहिता (Section 314) की उस व्यवस्था को आगे बढ़ाता है जिसका उद्देश्य गर्भवती स्त्रियों को असुरक्षित अथवा जबरन गर्भपात के प्रयासों से बचाना था। विधि-निर्माताओं ने माना कि गर्भसमापन हेतु किए गए कृत्य से केवल भ्रूण ही नहीं, स्वयं स्त्री का भी प्राणघातक जोखिम होता है। कानून ऐसे कृत्य से हुई मृत्यु को गर्भपात संबंधी अपराध से पृथक रूप से दंडित करता है, और सहमति के अभाव में किए गए कृत्य को अधिक कठोर दंड इसलिए देता है क्योंकि उसमें स्त्री की स्वायत्तता और देहगत अखंडता का अतिरिक्त उल्लंघन निहित होता है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने, समान आईपीसी प्रावधान की व्याख्या करते हुए, कहा है कि अभियोजन को यह सिद्ध करना होता है कि अभियुक्त का उद्देश्य गर्भपात कराना था और स्त्री की मृत्यु उसी कृत्य के परिणामस्वरूप हुई — भले ही मृत्यु का इरादा या पूर्वानुमान न रहा हो। न्यायालयों ने यह भी रेखांकित किया है कि सहमति का अभाव अपराध की गम्भीरता बढ़ा देता है, क्योंकि जब स्त्री के शरीर पर किया गया उपाय उसकी इच्छा के विरुद्ध हो, तो दोष अधिक माना जाता है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: इस कानून के लागू होने के लिए आवश्यक है कि उस व्यक्ति का उद्देश्य स्त्री की मृत्यु कराना रहा हो।

    तथ्य: कानून को केवल गर्भपात कराने के इरादे की आवश्यकता होती है, हत्या के इरादे की नहीं; कृत्य से मृत्यु घटित होना ही उपधारा (1) के तहत दंड के लिए पर्याप्त है।

  • मिथक: यदि स्त्री ने गर्भपात के लिए सहमति दे दी थी, तो भले ही उसकी मृत्यु हो जाए, कोई अपराध नहीं बनता।

    तथ्य: भले ही उसकी सहमति रही हो, यदि उस कृत्य से उसकी मृत्यु होती है तो उपधारा (1) फिर भी लागू होती है; और अधिक कठोर दंड वाली उपधारा (2) केवल तभी लागू होती है जब सहमति का अभाव हो।