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सं Samvidhan

Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023

धारा 257

Public servant in judicial proceeding corruptly making report, etc., contrary to law

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान, जो पहले भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 219 था, स्वयं न्यायिक और अर्द्ध-न्यायिक अधिकारियों में होने वाली भ्रष्टाचार या द्वेषपूर्ण आचरण को लक्षित करता है—वे ही लोग जिन पर निष्पक्ष रूप से विधि लागू करने का दायित्व है। क्योंकि उनके निर्णय विधि का बल रखते हैं और सीधे लोगों की स्वतंत्रता व संपत्ति को प्रभावित करते हैं, इसलिए विधि के विरुद्ध होने का ज्ञान होते हुए दिया गया भ्रष्ट या द्वेषपूर्ण निर्णय सार्वजनिक विश्वास का गंभीर उल्लंघन माना जाता है और कड़ी दंडनीयता का पात्र है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: न्यायिक अधिकारी अपने पद पर किए गए निर्णयों के लिए आपराधिक अभियोजन से मुक्त नहीं हैं।

    तथ्य: यह प्रावधान विशेष रूप से उस लोक सेवक के भ्रष्ट या द्वेषपूर्ण न्यायिक निर्णय को, जिसे वह विधि के प्रतिकूल होना जानता है, दंडनीय बनाता है—यह दर्शाते हुए कि भ्रष्ट रूप से किए गए न्यायिक कृत्य दंड-मुक्त (इम्यून) नहीं हैं।