Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023
धारा 146
Unlawful compulsory labour
Whoever unlawfully compels any person to labour against the will of that person, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to one year, or with fine, or with both.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह प्रावधान पुराने भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 374 से आया है, जिसकी रचना उस दौर में हुई थी जब ‘बेगार’ (बलपूर्वक बिना वेतन का श्रम), बंधुआ मज़दूरी और दबाव वाले श्रम-प्रबंध उपनिवेशकालीन और सामंती भारत में सामान्य थे। इसका उद्देश्य साधारण लोगों को बिना सहमति काम कराने के विरुद्ध एक दंडनीय उपाय देना था। यह प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 23 के साथ मिलकर काम करता है, जो अलग से जबरन श्रम और मानव तस्करी को असंवैधानिक घोषित करता है, यह दर्शाते हुए कि भारत की विधि-व्यवस्था जबरन श्रम को एक ओर संवैधानिक गलत और दूसरी ओर आपराधिक अपराध—दोनों मानती है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
धारा 374 आईपीसी (अब धारा 146 बीएनएस) की विशेष व्याख्या पर प्रकाशित नजीरों की संख्या सीमित है, परंतु न्यायालयों ने संविधान के अनुच्छेद 23 की व्याख्या करते हुए ‘जबरन श्रम’ की व्यापक धारणा को आकार दिया है। पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1982) में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि ‘जबरन श्रम’ केवल शारीरिक बल तक सीमित नहीं है—किसी को न्यूनतम मज़दूरी से कम पर काम कराना, या आर्थिक विवशता में वास्तविक विकल्प के बिना काम कराना भी बाध्य करने के समतुल्य हो सकता है। इस तर्क ने बंधुआ व जबरन श्रम के संदर्भों में ‘गैरकानूनी रूप से बाध्य करना’ और ‘इच्छा के विरुद्ध’ जैसे शब्दों की समझ को प्रभावित किया है, यद्यपि साधारण आपराधिक मामलों में धारा 374/146 लागू करते समय न्यायालय अभी भी सीधे दबाव के तथ्य (धमकी, कैद, या बल प्रयोग) देखते हैं।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह कानून केवल दासता या अपहरण जैसे अति चरम मामलों पर ही लागू होता है—ऐसा कहना गलत है।
तथ्य: संबंधित जबरन-श्रम सिद्धांतों की व्याख्या करते हुए न्यायालयों ने कहा है कि सूक्ष्म दबाव भी—जैसे धमकियाँ, कर्ज़ के जाल, या दबाव में न्यूनतम मज़दूरी से बहुत कम भुगतान—किसी की इच्छा के विरुद्ध श्रम करवाने के रूप में गिना जा सकता है।
मिथक: यदि मज़दूर को कुछ भुगतान किया गया हो, तो इसे ‘जबरन श्रम’ नहीं माना जा सकता—ऐसा मानना सही नहीं है।
तथ्य: भुगतान अपने आप श्रम को स्वैच्छिक नहीं बना देता; यदि काम किसी व्यक्ति की वास्तविक इच्छा के विरुद्ध बल या दबाव के कारण कराया गया हो, तो यह धारा फिर भी लागू हो सकती है।