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सं Samvidhan

Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023

धारा 133

Assault or criminal force with intent to dishonour person, otherwise than on grave

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

भारतीय दंड कानून सामान्य आक्रमण और किसी की गरिमा या मान–सम्मान को विशेष रूप से नीचा दिखाने के उद्देश्य से किए गए आक्रमण में लंबे समय से भेद करता आया है। यह प्रावधान (पुराने Indian Penal Code की धारा 355 से आगे बढ़ाया गया) मानता है कि किसी को सार्वजनिक रूप से या दूसरों के सामने अपमानित करने के इरादे से किया गया हमला एक अलग प्रकार की हानि पहुँचाता है — प्रतिष्ठात्मक और सामाजिक अपमान — जो मात्र शारीरिक चोट से परे है। कानून एक अपवाद भी रखता है: यदि पीड़ित ने गंभीर और आकस्मिक उकसावा दिया हो, तो अपराधी की दायित्व–स्थिति अलग ढंग से (आमतौर पर किसी अलग, हलके प्रावधान के तहत) आँकी जाती है, क्योंकि कानून गंभीर त्वरित उकसावे पर हुई प्रतिक्रिया के प्रति कुछ उदारता दिखाता है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

अदालतों ने सामान्यतः माना है कि अभियोजन को पीड़ित का अनादर करने की विशिष्ट मंशा सिद्ध करनी होती है, केवल चोट पहुँचाने या भय उत्पन्न करने की मंशा नहीं — मात्र आक्रमण, यदि अपमानित करने के इरादे का प्रमाण न हो, तो इस धारा के अंतर्गत नहीं आता। अदालतें मंशा निकालने के लिए प्रसंग पर भी दृष्टि डालती हैं, जैसे सार्वजनिक स्थल, प्रयुक्त शब्द, या छूने का ढंग। ‘गंभीर और आकस्मिक उकसावा’ वाले अपवाद की संकीर्ण व्याख्या की गई है, जिसमें इतना गंभीर उकसावा अपेक्षित है जो आत्म–नियंत्रण खो देने की युक्तिसंगत व्याख्या कर सके, न कि सामान्य झुंझलाहट या तकरार।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: कोई भी शारीरिक झगड़ा अपने–आप इस धारा में आ जाता है — यह कथन गलत है।

    तथ्य: अदालतें यह प्रमाण चाहती हैं कि आक्रमण विशेष रूप से पीड़ित का अनादर या अपमान करने के इरादे से किया गया था, केवल दर्द या भय पैदा करने के लिए नहीं।

  • मिथक: यदि पीड़ित ने पहले कुछ चिढ़ाने वाली बात कह दी, तो हमलावर अपने–आप बरी हो जाता है — यह सही नहीं है।

    तथ्य: अपवाद केवल ‘गंभीर और आकस्मिक उकसावे’ पर लागू होता है — यानी गंभीर, तत्काल उकसावा; न कि मामूली झुंझलाहट या सामान्य बहस।