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सं Samvidhan

Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023

धारा 111

Organised crime

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

भारतीय न्याय संहिता (Bharatiya Nyaya Sanhita) से पहले, भारत में ‘संगठित अपराध’ को परिभाषित करने वाला कोई एक केन्द्रीय कानून नहीं था — केवल महाराष्ट्र का MCOCA या कर्नाटक का KCOCA जैसे राज्य क़ानून माफ़िया‑शैली के गिरोहों को कवर करते थे, जिससे अनेक राज्यों के पास ऐसे औज़ार नहीं थे। सामान्य आपराधिक कानून, राज्यों की सीमाएँ पार करके काम करने वाले अपराध सिंडिकेटों — जैसे साइबर ठगी, तस्करी, जबरन वसूली के रैकेट और भूमि माफिया — से निपटने में कमजोर पड़ता था, जिन्हें अक्सर बार‑बार अपराध करने वाले लोग व्यक्तिगत मामलों में सज़ा से बच निकल कर संरक्षण देते थे। धारा 111 पूरे देश के लिए संगठित अपराध की एक समान, आधुनिक परिभाषा देने के लिए लाई गई — जिसमें आर्थिक अपराध और साइबर‑अपराध को स्पष्ट रूप से शामिल किया गया — और ताकि केवल मुख्य कर्ताओं ही नहीं, बल्कि मददगारों, आश्रय देने वालों और ऐसे सिंडिकेटों के आर्थिक लाभार्थियों को भी दंडित किया जा सके।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: संगठित अपराध केवल माफिया जैसी हिंसक गैंगों तक ही सीमित है।

    तथ्य: यह कानून साइबर‑अपराध, भूमि हड़पना, और धोखाधड़ी व हवाला जैसी आर्थिक अपराधों को भी कवर करता है।

  • मिथक: सिर्फ एक अपराध करना किसी को ‘संगठित अपराध सिंडिकेट’ का सदस्य कहने के लिए पर्याप्त है।

    तथ्य: कानून ‘निरंतर अवैध गतिविधि’ मानने के लिए एक पैटर्न की मांग करता है — पिछले दस वर्षों में एक से अधिक आरोप‑पत्र दायर हो कर न्यायालय द्वारा संज्ञान में लिए गए हों।

  • मिथक: केवल वही लोग दंडित होते हैं जो वास्तव में अपराध करते हैं।

    तथ्य: कानून उन लोगों को भी दंडित करता है जो योजना बनाते हैं, मदद करते हैं, अपराधी को छिपाते हैं, या अपराध से अर्जित संपत्ति अपने पास रखते हैं — और आश्रय देने के अपराध में अपराधी के जीवनसाथी को अपवाद दिया गया है।