The Constitution of India
अनुच्छेद 347
किसी राज्य की जनसंख्या के किसी अनुभाग द्वारा बोली जाने वाली भाषा के संबंध में विशेष उपबंध
किसी राज्य की जनसंख्या के किसी अनुभाग द्वारा बोली जाने वाली भाषा के संबंध में विशेष उपबंध— यदि इस निमित्त मांग किए जाने पर राष्ट्रपति का यह समाधान हो जाता है कि किसी राज्य की जनसंख्या का पर्याप्त भाग यह चाहता है कि उसके द्वारा बोली जाने वाली भाषा को राज्य द्वारा मान्यता दी जाए तो वह निदेश दे सकेगा कि ऐसी भाषा को भी उस राज्य में सर्वत्र या उसके किसी भाग में ऐसे प्रयोजन के लिए, जो वह विनिर्दिष्ट करे, शासकीय मान्यता दी जाए । अध्याय 3 - उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालयों, आदि की भाषा
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
भारत के राज्यों का पुनर्गठन मुख्यतः भाषायी आधार पर हुआ, पर किसी भी राज्य के भीतर अक्सर ऐसी भाषायी अल्पसंख्यक समुदाय होते हैं जो बहुसंख्यक नहीं हैं। यह प्रावधान इसलिए जोड़ा गया कि यदि किसी राज्य के भीतर कोई महत्वपूर्ण भाषायी समूह महसूस करे कि उसकी भाषा का सरकारी कामकाज में उपेक्षा हो रही है, तो राज्य की सीमाएँ बदले बिना या राज्य की प्राथमिक आधिकारिक भाषा बदले बिना, राष्ट्रपति के माध्यम से उस भाषा को राज्य के भीतर आधिकारिक मान्यता दिलाने का संवैधानिक मार्ग उपलब्ध हो।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह अनुच्छेद किसी छोटी-सी टोली को अपनी अलग आधिकारिक भाषा की माँग करने की खुली छूट देता है — ऐसा नहीं है।
तथ्य: राष्ट्रपति को संतुष्ट होना चाहिए कि राज्य की आबादी का ‘उल्लेखनीय अनुपात’ उस भाषा को बोलता है — यह बहुत छोटी अल्पसंख्यकों के लिए नहीं है।
मिथक: यह राज्य की मुख्य आधिकारिक भाषा को बदल देता है — यह कथन गलत है।
तथ्य: यह केवल कुछ विशेष उद्देश्यों या निर्धारित क्षेत्रों के लिए अतिरिक्त आधिकारिक मान्यता जोड़ता है; यह राज्य की विद्यमान आधिकारिक भाषा का स्थानापन्न नहीं बनता।