The Constitution of India
अनुच्छेद 323
लोक सेवा आयोगों के प्रतिवेदन
लोक सेवा आयोगों के प्रतिवेदन — (1) संघ आयोग का यह कर्तव्य होगा कि वह राष्ट्रपति को आयोग द्वारा किए गए कार्य के बारे में प्रतिवर्ष प्रतिवेदन दे और राष्ट्रपति ऐसा प्रतिवेदन प्राप्त होने पर उन मामलों के संबंध में, यदि कोई हों, जिनमें आयोग की सलाह स्वीकार नहीं की गई थी, ऐसी अस्वीकृति के कारणों को स्पष्ट करने वाले ज्ञापन सहित उस प्रतिवेदन की प्रति संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगा । (2) राज्य आयोग का यह कर्तव्य होगा कि वह राज्य के राज्यपाल 1*** को आयोग द्वारा किए गए कार्य के बारे में प्रतिवर्ष प्रतिवेदन दे और संयुक्त आयोग का यह कर्तव्य होगा कि ऐसे राज्यों में से प्रत्येक के, जिनकी आवश्यकताओं की पूर्ति संयुक्त आयोग द्वारा की जाती है, राज्यपाल 1*** को उस राज्य के संबंध में आयोग द्वारा किए गए कार्य के बारे में प्रतिवर्ष प्रतिवेदन दे और दोनों में से प्रत्येक दशा में ऐसा प्रतिवेदन प्राप्त होने पर, राज्यपाल 2*** उन मामलों के संबंध में, यदि कोई हों, जिनमें आयोग की सलाह स्वीकार नहीं की गई थी, ऐसी अस्वीकृति के कारणों को स्पष्ट करने वाले ज्ञापन सहित उस प्रतिवेदन की प्रति राज्य के विधान-मंडल के समक्ष रखवाएगा । अधिकरण
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
लोक सेवा आयोगों को स्वतंत्र निकाय के रूप में इस उद्देश्य से रचा गया कि वे राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रहकर निष्पक्ष, योग्यता-आधारित नियुक्ति तथा सिविल सेवा विषयों पर सलाह सुनिश्चित करें। अनुच्छेद 323 इस स्वतंत्रता में जवाबदेही जोड़ता है: क्योंकि आयोग सीधे मतदाताओं के प्रति उत्तरदायी नहीं होते, इसलिए विधानमंडल को वार्षिक प्रतिवेदन देना अनिवार्य करने से उनका कार्य पारदर्शी रहता है और सरकारों को विशेषज्ञ सलाह से भिन्न जाने पर सार्वजनिक रूप से कारण बताने पड़ते हैं, जिससे योग्यता-आधारित अनुशंसाओं को चुपचाप दरकिनार करने से रोका जाता है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: सरकार को हमेशा लोक सेवा आयोग की सलाह का पालन करना ही होता है।
तथ्य: आयोग की सलाह विधिक रूप से बाध्यकारी नहीं है; सरकार उसे अस्वीकार कर सकती है, पर अनुच्छेद 323 ऐसी अस्वीकृतियों को विधानमंडल के समक्ष सार्वजनिक रूप से समझाना अनिवार्य करता है।
मिथक: यह प्रतिवेदन-और-स्पष्टीकरण की प्रक्रिया केवल कभी-कभार या विवाद होने पर ही होती है।
तथ्य: यह अनुच्छेद इसे वार्षिक और अनिवार्य दायित्व बनाता है; यह न तो एकमुश्त व्यवस्था है और न ही केवल विवेकाधीन।