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सं Samvidhan

The Constitution of India

अनुच्छेद 243N

विद्यमान विधियों और पंचायतों का बना रहना

विद्यमान विधियों और पंचायतों का बना रहना— इस भाग में किसी बात के होते हुए भी, संविधान (तिहत्तरवां संशोधन) अधिनियम, 1992 के प्रारंभ के ठीक पूर्व किसी राज्य में प्रवृत्त पंचायतों से संबंधित किसी विधि का कोई उपबंध, जो इस भाग के उपबंधों से असंगत है, जब तक सक्षम विधान-मंडल द्वारा या अन्य सक्षम प्राधिकारी द्वारा उसे संशोधित या निरसित नहीं कर दिया जाता है या जब तक ऐसे प्रारंभ से एक वर्ष समाप्त नहीं हो जाता है, इनमें से जो भी पहले हो, तब तक प्रवृत्त बना रहेगा: परंतु ऐसे प्रारंभ के ठीक पूर्व विद्यमान सभी पंचायतें, यदि उस राज्य की विधान सभा द्वारा या ऐसे राज्य की दशा में, जिसमें विधान परिषद् है, उस राज्य के विधान- मंडल के प्रत्येक सदन द्वारा पारित इस आशय के संकल्प द्वारा पहले ही विघटित नहीं कर दी जाती हैं तो, अपनी अवधि की समाप्ति तक बनी रहेंगी ।

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

73वें संवैधानिक संशोधन (1992) ने पूरे भारत में पंचायत राज संस्थाओं के लिए चुनाव, आरक्षण, अधिकार–क्षेत्र और वित्त जैसे विषयों पर एक विस्तृत, समान ढाँचा प्रस्तुत किया। पर राज्यों के पास पहले से अपने—और कई बार बहुत भिन्न—पंचायत क़ानून तथा कार्यरत पंचायतें थीं। संशोधन लागू होने के दिन ही इन्हें निरर्थक कर देना कानूनी अव्यवस्था और स्थानीय शासन में व्यवधान पैदा करता। इसी हेतु अनुच्छेद 243N को संक्रमणकालीन पुल के रूप में जोड़ा गया: इसने पुराने, असंगत क़ानूनों को थोड़े समय (अधिकतम एक वर्ष) तक जीवित रहने दिया ताकि राज्य सुव्यवस्थित ढंग से अपना विधान अद्यतन कर सकें, और प्रचलित पंचायतों को रातोंरात भंग करने के बजाय अपना कार्यकाल पूरा करने दिया।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: अनुच्छेद 243N का अर्थ यह नहीं है कि पुराने पंचायत क़ानून बिना राज्य की कार्रवाई के सदा के लिए मान्य रहे।

    तथ्य: यह सुरक्षा अस्थायी थी—यह 73वाँ संशोधन लागू होने की तिथि से एक वर्ष बाद स्वतः समाप्त हो जाती थी, या उससे पहले यदि सम्बंधित क़ानून संशोधित/निरस्त कर दिया जाए; जो भी पहले हो।

  • मिथक: 73वाँ संशोधन लागू होते ही सभी प्रचलित पंचायतों को तुरंत भंग कर देना आवश्यक था—यह कथन गलत है।

    तथ्य: उपबंध (प्रोवाइज़ो) ने विशेष रूप से यह अनुमति दी कि प्रचलित पंचायतें अपना कार्यकाल पूरा होने तक चलती रहें, जब तक राज्य विधानमंडल उन्हें पहले भंग करने का प्रस्ताव पारित न कर दे।