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सं Samvidhan

The Constitution of India

अनुच्छेद 201

विचार के लिए आरक्षित विधेयक

विचार के लिए आरक्षित विधेयक— जब कोई विधेयक राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रख लिया जाता है तब राष्ट्रपति घोषित करेगा कि वह विधेयक पर अनुमति देता है या अनुमति रोक लेता है: परंतु जहां विधेयक धन विधेयक नहीं है वहां राष्ट्रपति राज्यपाल को यह निदेश दे सकेगा कि वह विधेयक को, यथास्थिति, राज्य के विधान-मंडल के सदन या सदनों को ऐसे संदेश के साथ, जो अनुच्छेद 200 के पहले परंतुक में वर्णित है, लौटा दे और जब कोई विधेयक इस प्रकार लौटा दिया जाता है तब ऐसा संदेश मिलने की तारीख से छह मास की अवधि के भीतर सदन या सदनों द्वारा उस पर तदनुसार पुनर्विचार किया जाएगा और यदि वह सदन या सदनों द्वारा संशोधन सहित या उसके बिना फिर से पारित कर दिया जाता है तो उसे राष्ट्रपति के समक्ष उसके विचार के लिए फिर से प्रस्तुत किया जाएगा । वित्तीय विषयों के संबंध में प्रक्रिया

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह अनुच्छेद विशेष परिस्थितियों में राष्ट्रपति के माध्यम से संघ सरकार को राज्य विधिनिर्माण पर नियंत्रण-जांच का साधन देता है — जैसे ऐसे विधेयक जो राष्ट्रीय हित, संवैधानिक वैधता, या केंद्र के समन्वय की आवश्यकता वाले विषयों को प्रभावित करते हों। यह अनुच्छेद 111 के अंतर्गत संघीय विधेयकों पर राष्ट्रपति की शक्ति का प्रतिबिंब है, पर इसमें पुनर्विचार का एक चरण (अनुच्छेद 200 के उपबंध के समान) जोड़ा गया है, ताकि अंतिम निर्णय से पहले निर्वाचित राज्य विधानमंडल को राष्ट्रपति की चिंताओं का उत्तर देने का एक अवसर अवश्य मिले — संघीय पर्यवेक्षण और राज्य की विधायी स्वायत्तता के बीच संतुलन बनाए रखते हुए।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

न्यायालयों ने सामान्यतः अनुच्छेद 201 के अंतर्गत राष्ट्रपति की शक्ति को विवेकाधीन माना है, जो संघ मंत्रिपरिषद की सलाह और सहायता पर प्रयोग होती है, ठीक वैसे ही जैसे अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल की भूमिका। हालांकि, इस अनुच्छेद में राष्ट्रपति की कार्रवाई के लिए कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं है, और यह मौन हाल के वर्षों में न्यायिक एवं जन-चर्चा का विषय बना — विशेषकर तमिलनाडु और केरल के राज्यपालों द्वारा सुरक्षित रखे गए विधेयकों से जुड़ी विवादित स्थितियों (2023–2024) में — जहाँ न्यायालयों और विद्वानों ने आशंका जताई कि अनिश्चित विलंब व्यवहार में ‘पॉकेट वीटो’ (pocket veto) जैसा प्रभाव डाल सकता है, जिससे विधायी प्रक्रिया दुर्वल हो जाती है। इन मुद्दों पर बहस तो हुई है, पर किसी विशिष्ट समय-सीमा को बाध्यकारी रूप से तय करने वाला स्थिर नज़ीर अभी नहीं है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: राष्ट्रपति किसी विधेयक को जितनी बार चाहें राज्य विधानमंडल को वापस भेज सकते हैं।

    तथ्य: उपबंध केवल एक दौर का पुनर्विचार अनुमति देता है; विधेयक पुनः पारित होकर लौट आने के बाद राष्ट्रपति को अंतिम निर्णय देना ही होगा।

  • मिथक: अनुच्छेद 201 एक निश्चित समय-सीमा तय करता है जिसके भीतर राष्ट्रपति को निर्णय लेना होता है।

    तथ्य: पाठ में राष्ट्रपति के निर्णय के लिए कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं है, और इसी कारण व्यवहार में लंबे विलंब पर वास्तविक विवाद उत्पन्न हुए हैं।