Skip to content
सं Samvidhan

The Constitution of India

अनुच्छेद 181

जब अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब उसका पीठासीन न होना

जब अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब उसका पीठासीन न होना— (1) विधान सभा की किसी बैठक में, जब अध्यक्ष को उसके पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब अध्यक्ष, या जब उपाध्यक्ष को उसके पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब उपाध्यक्ष, उपस्थित रहने पर भी, पीठासीन नहीं होगा और अनुच्छेद 180 के खंड (2) के उपबंध ऐसी प्रत्येक बैठक के संबंध में वैसे ही लागू होंगे जैसे वह उस बैठक के संबंध में लागू होते हैं जिससे, यथास्थिति, अध्यक्ष या उपाध्यक्ष अनुपस्थित है । (2) जब अध्यक्ष को उसके पद से हटाने का कोई संकल्प विधान सभा में विचाराधीन है तब उसको विधान सभा में बोलने और उसकी कार्यवाहियों में अन्यथा भाग लेने का अधिकार होगा और वह अनुच्छेद 189 में किसी बात के होते हुए भी, ऐसे संकल्प पर या ऐसी कार्यवाहियों के दौरान किसी अन्य विषय पर प्रथमत: ही मत देने का हकदार होगा किंतु मत बराबर होने की दशा में मत देने का हकदार नहीं होगा ।

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह अनुच्छेद निष्पक्षता और तटस्थता सुनिश्चित करता है: अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को अपने ही हटाने से संबंधित कार्यवाही का संचालन या निर्णय नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह स्वार्थ–संघर्ष होगा। साथ ही, वे अभी भी सभा के निर्वाचित सदस्य हैं, इसलिए उन्हें बोलने और मतदान करने के मूल लोकतांत्रिक अधिकार बने रहते हैं—बस बराबरी की स्थिति में अध्यक्षीय निर्णायक मत का विशेष अधिकार इस प्रसंग में लागू नहीं होता।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह कहना गलत है कि हटाने का प्रस्ताव दायर होते ही अध्यक्ष के सभी अधिकार समाप्त हो जाते हैं।

    तथ्य: अध्यक्ष केवल उसी विशेष बैठक की अध्यक्षता का अधिकार खोता है; वह प्रस्ताव पर चर्चा में बोल सकता है और प्रथम मतदान में मत भी दे सकता है।

  • मिथक: यह कथन गलत है कि अध्यक्ष अपने पद से हटाने के मतदान में, अन्य मामलों की तरह, बराबरी तोड़ सकता है।

    तथ्य: अनुच्छेद 181(2) विशेष रूप से यह स्पष्ट करता है कि जब प्रस्ताव स्वयं अध्यक्ष को हटाने से संबंधित हो, तो अध्यक्ष का सामान्य निर्णायक बराबरी‑तोड़ मत मान्य नहीं होगा।