The Constitution of India
अनुच्छेद 120
संसद् में प्रयोग की जाने वाली भाषा
संसद् में प्रयोग की जाने वाली भाषा— (1) भाग 17 में किसी बात के होते हुए भी, किन्तु अनुच्छेद 348 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, संसद् में कार्य हिन्दी में या अंग्रेजी में किया जाएगा: परन्तु, यथास्थिति, राज्य सभा का सभापति या लोक सभा का अध्यक्ष अथवा उस रूप में कार्य करने वाला व्यक्ति किसी सदस्य को, जो हिन्दी में या अंग्रेजी में अपनी पर्याप्त अभिव्यक्ति नहीं कर सकता है, अपनी मातृभाषा में सदन को संबोधित करने की अनुज्ञा दे सकेगा । (2) जब तक संसद् विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करे तब तक इस संविधान के प्रारंभ से पंद्रह वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् यह अनुच्छेद ऐसे प्रभावी होगा मानो “या अंग्रेजी में” शब्दों का उसमें से लोप कर दिया गया हो ।
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
स्वतंत्रता के समय संविधान रचनाकार चाहते थे कि देश की भाषाई विविधता को देखते हुए अंग्रेज़ी को व्यावहारिक संक्रमणकालीन भाषा बनाकर रखते हुए, हिन्दी धीरे‑धीरे संसद और शासन की प्रमुख भाषा बने। उपधारा (2) में अंग्रेज़ी के लिए 15 वर्ष की समयसीमा जोड़ी गई थी—यह आशा रखते हुए कि 1965 तक हिन्दी संसदीय कार्य पूर्णतः संभाल लेगी। परन्तु विशेषकर दक्षिण के गैर‑हिन्दी भाषी राज्यों के कड़े विरोध के चलते संसद ने इसी उपधारा के अंतर्गत अपनी शक्ति का प्रयोग कर अंग्रेज़ी को अतिरिक्त राजभाषा के रूप में अनिश्चितकाल तक बनाए रखा, मुख्यतः Official Languages Act, 1963 के माध्यम से।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
अनुच्छेद 120 प्रायः सर्वोच्च न्यायालय में बड़े विवाद का विषय नहीं रहा, क्योंकि यह संसद की आंतरिक प्रक्रियात्मक कार्यवाही से जुड़ा है, जहाँ न्यायालय परंपरागत रूप से हस्तक्षेप से संकोच करते हैं। इसकी सबसे महत्वपूर्ण ‘व्याख्या’ न्यायालयों से नहीं, बल्कि विधायी कार्रवाई से आई: संसद ने उपधारा (2) के तहत Official Languages Act, 1963 बनाया, जिससे 1965 के बाद भी अंग्रेज़ी हिन्दी के साथ जारी रही और संविधान द्वारा मूलतः निर्धारित स्वतः‑समाप्ति टल गई।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: 1965 के बाद अंग्रेज़ी का संसद में उपयोग पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया था।
तथ्य: संसद ने अनुच्छेद 120(2) के तहत अपनी शक्ति का प्रयोग कर Official Languages Act, 1963 पारित किया, जिससे अंग्रेज़ी हिन्दी के साथ अनिश्चितकाल तक उपयोग में बनी रही और 15 वर्ष की स्वतः समाप्ति प्रभावी होने से रुक गई।
मिथक: कोई भी सांसद अपने अधिकार के रूप में संसद में किसी भी भारतीय भाषा में स्वतंत्र रूप से बोल सकता है।
तथ्य: संविधान केवल तभी हिन्दी या अंग्रेज़ी के अलावा किसी मातृभाषा के उपयोग की अनुमति देता है जब पीठासीन अधिकारी (अध्यक्ष या सभापति) विशेष रूप से इसकी मंज़ूरी दें, और आमतौर पर तब, जब सदस्य दोनों आधिकारिक भाषाओं में पर्याप्त रूप से अभिव्यक्त नहीं कर पाता।