Indian Penal Code, 1860
धारा 415
repealedCheating
Whoever, by deceiving any person, fraudulently or dishonestly induces the person so deceived to deliver any property to any person, or to consent that any person shall retain any property, or intentionally induces the person so deceived to do or omit to do anything which he would not do or omit if he were not so deceived, and which act or omission causes or is likely to cause damage or harm to that person in body, mind, reputation or property, is said to “cheat”.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह धारा धोखाधड़ी के अपराध को परिभाषित करती है—यह संपत्ति-संबंधी सबसे सामान्यत: प्रयुक्त अपराधों में से एक है, जिसका उद्देश्य लोगों को छल के माध्यम से उनकी संपत्ति गंवाने या अपने ही हित के विरुद्ध कार्य करने के लिए बहकाए जाने से बचाना है। यह इसलिए आवश्यक है क्योंकि छल-आधारित हानि, चोरी से भिन्न, पीड़ित के अनजाने में उसकी स्वयं की भागीदारी से होती है, जिसके निवारण हेतु अलग विधिक ढाँचे की जरूरत होती है। भारतीय न्याय संहिता, 2023 के अंतर्गत इसका समतुल्य प्रावधान Section 318(1) है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
न्यायालयों ने लगातार रेखांकित किया है कि धोखाधड़ी सिद्ध करने के लिए छल के साथ-साथ कपटपूर्ण या बेईमान प्रलोभन का प्रमाण होना चाहिए; मात्र वचनभंग या दीवानी संविदात्मक चूक, जब तक आरंभ से ही बेईमान नीयत न रही हो, धोखाधड़ी नहीं बनती। सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न निर्णयों में स्पष्ट किया है कि बेईमान नीयत वचन देते समय से ही मौजूद रही हो, केवल बाद में वादा टूट जाने से काम नहीं चलता।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: कोई भी टूटा हुआ वादा या असफल व्यावसायिक सौदा धोखाधड़ी माना जाता है।
तथ्य: धोखाधड़ी सिद्ध करने के लिए यह दिखाना आवश्यक है कि वादा करते समय ही बेईमान या कपटपूर्ण नीयत मौजूद थी; मात्र यह नहीं कि बाद में कोई वास्तविक विफलता के कारण वादा पूरा न हो सका।