Indian Penal Code, 1860
धारा 345
repealedWrongful confinement of person for whose liberation writ has been issued
Whoever keeps any person in wrongful confinement, knowing that a writ for the liberation of that person has been duly issued, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to two years in addition to any term of imprisonment to which he may be liable under any other section of this Chapter.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
हैबियस कॉर्पस (habeas corpus) की रिट अवैध निरुद्धि से मुक्ति का एक मूलभूत विधिक साधन है। ऐसे आदेश की अवहेलना करना केवल बंद व्यक्ति की स्वतंत्रता की उपेक्षा नहीं, बल्कि न्याय-व्यवस्था के प्रति जानबूझकर अनादर का संकेत है; इसलिए कानून इस विशेष अवज्ञा पर अतिरिक्त दंड की परत जोड़ता है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
यह धारा हैबियस कॉर्पस (habeas corpus) नामक संवैधानिक उपचार से निकटता से जुड़ी है; न्यायालय, हैबियस कॉर्पस की रिट के बाद भी निरुद्धि जारी रखने को, बंदीकरण के लिए पहले से विद्यमान आपराधिक दायित्व के अतिरिक्त, न्यायिक प्राधिकार के प्रति गंभीर अपमान मानते हैं।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह सामान्य ग़लत बंदीकरण जैसा नहीं है।
तथ्य: यह दंड विशेष रूप से बंदीकरण के अपने दंड के ऊपर जोड़ा जाता है, और तभी लागू होता है जब रिहाई का न्यायालय-आदेश (रिट) जारी होने की जानकारी उस व्यक्ति को हो चुकी हो।