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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 226

repealed

Unlawful return from transportation.

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

धारा 226 मूल रूप से उन अपराधियों से सम्बंधित थी जिन्हें “परिवहन” (सजा के रूप में दूर—अक्सर विदेश—भेज देना) दिया गया था और जो अपनी अवधि समाप्त होने से पहले अवैध रूप से लौट आते थे। जब ‘परिवहन’ नामक दंड स्वयं अप्रचलित हो गया और आपराधिक प्रक्रिया में व्यापक सुधार हुए, तो उससे जुड़ी धाराएँ अनावश्यक मानी गईं। 1955 में आपराधिक प्रक्रिया क़ानून में हुए संशोधन ने ऐसे पुरातन प्रावधानों की सफ़ाई की, और धारा 226 को औपचारिक रूप से निरस्त कर दिया गया।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: धारा 226 का आज भी किसी पर अभियोग लगाने के लिए उपयोग किया जा सकता है।

    तथ्य: इसे 1955 में पूर्णतः निरस्त कर दिया गया था और आधुनिक भारत में इसका कोई विधिक प्रभाव नहीं है।

  • मिथक: निरसन का अर्थ है कि ‘परिवहन’ दंड अब भी मौजूद है, बस उसके उल्लंघन पर दंड नहीं है।

    तथ्य: ‘परिवहन’ दंड स्वयं ही समाप्त कर दिया गया, इसी कारण उसके उल्लंघन को दंडित करने वाली यह धारा अनावश्यक हो गई और हटा दी गई।