Indian Penal Code, 1860
धारा 216
repealedHarbouring offender who has escaped from custody or whose apprehension has been ordered
Whenever any person convicted of or charged with an offence, being in lawful custody for that offence, escapes from such custody, or whenever a public servant, in the exercise of the lawful powers of such public servant, orders a certain person to be apprehended for an offence, whoever, knowing of such escape or order for apprehension, harbours or conceals that person with the intention of preventing him from being apprehended, shall be punished in the manner following, that is to say:
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह व्यवस्था 1860 के मूल भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) से आई है, जिसे ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन के अधीन न्याय-प्रणाली की अभिरक्षा और गिरफ्तारी आदेशों के प्रवर्तन को सुदृढ़ करने हेतु बनाया गया था। यह मानती है कि अभियुक्त या दोषसिद्ध व्यक्ति का भाग जाना, या वैध गिरफ्तारी-आदेश से बच निकलना, विधि के शासन को कमजोर करता है। ऐसे व्यक्तियों को जानबूझकर शरण देने को अपराध घोषित कर, कानून का उद्देश्य नागरिकों द्वारा राज्य की अपराधियों को न्याय के समक्ष लाने की क्षमता में बाधा डालने को रोकना है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
भारतीय न्यायालयों ने सामान्यतः माना है कि केवल यह जान लेना कि कोई व्यक्ति फरार है, दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं—उस व्यक्ति को गिरफ्तारी से बचाने का स्पष्ट आशय होना चाहिए। न्यायालयों ने यह भी रेखांकित किया है कि अभिरक्षा या गिरफ्तारी-आदेश ‘वैध’ होना चाहिए; अर्थात यदि मूल निरुद्धीकरण या आदेश अवैध था, तो यह धारा लागू नहीं हो सकती। निर्णयों में साधारण आतिथ्य या पारिवारिक आसरा और विधि को निष्फल करने हेतु की गई सुनियोजित छिपाव में अंतर किया गया है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: सिर्फ इतना जान लेना कि कोई अभिरक्षा से भागा है, आपको दंडनीय बना देता है, चाहे आपने उसकी मदद के लिए कुछ न भी किया हो।
तथ्य: कानून केवल जानकारी होने से आगे की मांग करता है—आपने वास्तव में उस व्यक्ति को ठिकाना देना या छिपाना चाहिए, वह भी खास नीयत से कि उसे गिरफ्तारी से बचाया जा सके।
मिथक: यह धारा किसी भी ऐसे व्यक्ति पर लागू होती है जो पुलिस से छिप रहा हो, भले ही अभी तक औपचारिक गिरफ्तारी-आदेश या अभिरक्षा न बना हो।
तथ्य: यह धारा तभी लागू होती है जब वह व्यक्ति या तो वैधानिक अभिरक्षा से भागा हो, या किसी लोक सेवक द्वारा विधिपूर्वक किया गया गिरफ्तारी-आदेश उसके विरुद्ध विद्यमान हो।