Indian Penal Code, 1860
धारा 214
repealedOffering gift or restoration of property in consideration of screening offender
Whoever gives or causes, or offers or agrees to give or cause, any gratification to any person, or restores or causes the restoration of any property to any person, in consideration of that person’s concealing an offence, or of his screening any person from legal punishment for any offence, or of his not proceeding against any person for the purpose of bringing him to legal punishment;
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
Indian Penal Code, 1860 का उद्देश्य ऐसे निजी सौदों को रोकना था जो सार्वजनिक न्याय को कमजोर करते हैं। धारा 213 उस व्यक्ति को दंडित करती है जो अपराध छिपाने या अपराधी की रक्षा करने के लिए रिश्वत लेता है; धारा 214 उसी भ्रष्ट सौदे के दूसरे पक्ष—जो ऐसी रिश्वत देता है या देने का प्रस्ताव करता है—को दंडित करती है। मिलकर, ये धाराएँ पीड़ितों, गवाहों, पुलिस या बिचौलियों को पैसे देकर अपराधियों को न्याय से बच निकलने देने की प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए बनाई गईं, ताकि आपराधिक न्याय प्रणाली की अखंडता सुरक्षित रहे।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
अदालतों ने सामान्यतः धारा 214 को धारा 213 के साथ पढ़ा है, इन्हें एक ही भ्रष्ट लेन-देन के दो पहलू माना है—एक में लेने वाले को अपराध ठहराया गया है, दूसरे में देने वाले को। न्यायिक निर्णयों ने रेखांकित किया है कि प्राप्त तुष्टि या लौटाई गई संपत्ति का स्पष्ट संबंध अपराध छिपाने या अपराधी को विधिक कार्यवाही से बचाने के समझौते से होना चाहिए; किसी दीवानी विवाद का वैध समझौता या निपटारा, जिसमें आपराधिक न्याय में विघ्न डालने का इरादा न हो, इस धारा के दायरे में नहीं आता। अदालतों ने यह भी स्पष्ट किया है कि केवल पीड़ित को क्षतिपूर्ति का भुगतान, यदि अभियोजन रोकने या अपराध छिपाने का कोई सौदा न हो, तो इस प्रावधान में सम्मिलित नहीं है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: किसी आपराधिक मामले को ‘निपटाने’ के लिए पीड़ित को क्षतिपूर्ति देना इस धारा के तहत सदा अवैध है।
तथ्य: अदालतों ने वास्तविक, वैध क्षतिपूर्ति या समझौते (विशेषकर संगणनीय अपराधों में) को उन भुगतानों से अलग माना है जो खास तौर पर अपराध छिपाने या विधिक कार्यवाही रोकने के लिए किए जाएँ; केवल बाद वाली स्थिति धारा 214 के दायरे में आती है।
मिथक: केवल रिश्वत लेने वाला व्यक्ति (धारा 213 के तहत) दंडित किया जा सकता है, रिश्वत की पेशकश करने वाला नहीं।
तथ्य: धारा 214 विशेष रूप से तुष्टि देने वाले या उसकी पेशकश करने वाले को निशाना बनाती है, जिससे लेन-देन के दोनों पक्ष अलग-अलग प्रावधानों के तहत दंडनीय हो जाते हैं।