Skip to content
सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 149

repealed

Every member of unlawful assembly guilty of offence committed in prosecution of common object

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

धारा 149 को भारतीय दंड संहिता (IPC) के प्रণेताओं ने सामूहिक आपराधिक हिंसा—विशेषकर दंगे और भीड़-आधारित अपराध—से निपटने के लिए बनाया था, जो उपनिवेशकालीन भारत में आम थे। अव्यवस्थित भीड़ की स्थिति में व्यक्तिगत आपराधिक जिम्मेदारी साबित करना कठिन होता है। यह धारा न्यायालयों को यह अनुमति देती है कि अवैध जमाव का हर सदस्य, समूह के साझा उद्देश्य की पूर्ति में किए गए अथवा उस उद्देश्य से युक्तिसंगत रूप से पूर्वानुमेय अपराधों के लिए, बिना यह सिद्ध किए कि वास्तविक वार किसने किया, दायी ठहराया जा सके।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों, जिनमें सर्वोच्च न्यायालय भी शामिल है, ने बार‑बार स्पष्ट किया है कि ‘साझा उद्देश्य’ का पूर्वनियोजित योजना होना आवश्यक नहीं है — वह तत्क्षण भी बन सकता है और अपराध के समय जमाव के आचरण, साथ रखे गए हथियारों और व्यवहार से अनुमानित किया जा सकता है। न्यायालयों ने यह भी माना है कि मात्र उपस्थिति पर्याप्त नहीं; साझा उद्देश्य में सहभागिता का प्रमाण होना चाहिए। निर्णयों ने यह भी रेखांकित किया है कि दूसरा पहलू — ‘होने की संभावना वाले’ अपराध — समूह की कार्रवाइयों के अनचाहे परंतु पूर्वानुमेय परिणामों तक दायित्व का विस्तार करता है, जिससे यह धारा धारा 34 के अंतर्गत साधारण ‘साझा आशय’ से व्यापक हो जाती है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: सिर्फ वही व्यक्ति दंडित किया जा सकता है जिसने स्वयं अपराध किया हो — यह कथन धारा 149 के संबंध में गलत है।

    तथ्य: न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि अवैध जमाव का हर सदस्य, जो साझा उद्देश्य में सहभागी है, दोषी ठहराया जा सकता है, भले ही उसने व्यक्तिगत रूप से वह कृत्य न किया हो।

  • मिथक: सिर्फ किसी अवैध जमाव के पास खड़े रहने मात्र से आप स्वतः दोषी हो जाते हैं — यह कथन गलत है।

    तथ्य: न्यायालय यह प्रमाण चाहते हैं कि व्यक्ति उस जमाव का सदस्य था और उसके साझा उद्देश्य को वह साझा करता था; मात्र निष्क्रिय उपस्थिति पर्याप्त नहीं।

  • मिथक: अपराध बिल्कुल वही होना चाहिए जो समूह ने पहले से तय किया था — यह धारणा गलत है।

    तथ्य: दायित्व उन अपराधों तक भी फैलता है जिनके ‘होने की संभावना’ सदस्य जानते थे कि उनके साझा उद्देश्य का पीछा करते हुए पैदा हो सकती है, भले ही वे अपराध विशेष रूप से पूर्वनियोजित न रहे हों।