Indian Penal Code, 1860
धारा 107
repealedAbetment of a thing
A person abets the doing of a thing, who: Instigates any person to do that thing; or Engages with one or more other person or persons in any conspiracy for the doing of that thing, if an act or illegal omission takes place in pursuance of that conspiracy, and in order to the doing of that thing; or Intentionally aids, by any act or illegal omission, the doing of that thing.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
दंड विधि केवल उस व्यक्ति को दंडित नहीं करती जो शारीरिक रूप से अपराध करता है—यह उन्हें भी दंडित करती है जो अपराधी को धकेलते, साथ मिलकर योजना बनाते, या जान-बूझकर मदद करते हैं। आईपीसी (1860) के निर्माताओं ने, अंग्रेजी सामान्य विधि के ‘एक्सेसरी’ और ‘अकम्पलिस’ के विचारों से प्रभावित होकर, एक स्पष्ट परिभाषा चुनी ताकि उकसाने वाले, षड्यंत्रकारी और सहायकों को अंतिम कृत्य स्वयं न करने पर भी उत्तरदायी ठहराया जा सके, जिससे अपराध के आयोजक और सक्षम करने वाले केवल इस वजह से दायित्व से न बचें कि अंतिम “ट्रिगर” किसी और ने दबाया।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
भारतीय न्यायालय बार‑बार स्पष्ट कर चुके हैं कि मात्र उपस्थित रहना या चुपचाप जानना उत्सादन नहीं है—इसके लिए सक्रिय उकसावा, किसी षड्यंत्र में सहभागिता जिसके बाद कोई वास्तविक कृत्य हो, या जान-बूझकर सहायता आवश्यक है। न्यायालयों ने (उदाहरणतः आत्महत्या के उत्सादन के मामलों में) रेखांकित किया है कि उकसावे के लिए ऐसे शब्द या आचरण चाहिए जो विशिष्ट कृत्य को भड़काने के लिए हों, केवल कठोर कथन पर्याप्त नहीं। निर्णयों ने ‘सहायता’ और मात्र मौके पर मौजूद रहने में भी भेद किया है, और अपराध को सुगम बनाने के इरादे का प्रमाण मांगा है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: केवल वही व्यक्ति दंडित किया जा सकता है जो वास्तव में अपराध करता है।
तथ्य: कानून उकसाने वालों, षड्यंत्रकारियों और जान-बूझकर मदद करने वालों को भी दंडित करता है—इस धारा के तहत उन्हें उत्सादक (abettor) माना जाता है।
मिथक: केवल अपराध के समय मौजूद रहना ही उत्सादन माना जाता है।
तथ्य: न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि मात्र उपस्थिति पर्याप्त नहीं; वास्तविक उकसावा, उसके अनुरूप कृत्य के साथ षड्यंत्र, या जान-बूझकर सहायता होनी चाहिए।