Indian Penal Code, 1860
धारा 100
repealedWhen the right of private defence of the body extends to causing death
The right of private defence of the body extends, under the restrictions mentioned in the last preceding section, to the voluntary causing of death or of any other harm to the assailant, if the offence which occasions the exercise of the right be of any of the descriptions hereinafter enumerated, namely:
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
भारतीय आपराधिक कानून मानता है कि लोग हर समय पुलिस सुरक्षा की प्रतीक्षा नहीं कर सकते, इसलिए वह युक्तिसंगत आत्मरक्षा की अनुमति देता है। परन्तु असीमित आत्मरक्षा का दुरुपयोग होकर छोटी उकसाहटों पर हत्या को भी न्यायोचित ठहराया जा सकता था। इसी कारण आईपीसी (1860) के निर्माताओं ने, आत्मरक्षा पर अंग्रेजी कॉमन लॉ (English common law) के सिद्धान्तों से प्रभावित होकर, एक स्तरीकृत प्रणाली बनायी: धाराएँ 96–99 सामान्य सीमा-रेखाएँ और प्रतिबंध तय करती हैं, जबकि धारा 100 विशेष रूप से वे गम्भीर परिस्थितियाँ चिन्हित करती है (जैसे मृत्यु का खतरा, बलात्कार, अपहरण आदि) जिनमें घातक रक्षा उचित मानी जाती है। यह धारा, धारा 99 के प्रतिबंधों को आगे दी गई गम्भीर अपराधों की विशिष्ट सूची से जोड़ने वाली प्रस्तावनात्मक कड़ी के रूप में काम करती है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
भारतीय न्यायालय लगातार यह मानते आए हैं कि धारा 100 को धारा 99 से अलग-थलग पढ़ा नहीं जा सकता — सूचीबद्ध गम्भीर अपराधों में से कोई घटित हो रहा हो तब भी मृत्यु कारित करने का अधिकार निरपेक्ष नहीं है; प्रयुक्त शक्ति फिर भी आवश्यक और अनुपातिक होनी चाहिए, और रक्षक के पास परिस्थितियों में व्यावहारिक सुरक्षित पीछे हटने का साधन उपलब्ध नहीं होना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने Yogendra Morarji v. State of Gujarat तथा Darshan Singh v. State of Punjab जैसे मामलों में बल दिया है कि न्यायालयों को परिस्थितियों की समग्रता देखनी चाहिए — आक्रमण का स्वरूप, खतरे की आसन्नता, और क्या अभियुक्त को ईमानदारी से अपने जीवन पर खतरा प्रतीत हुआ — न कि केवल यांत्रिक तरीके से यह जाँचना कि स्थिति सूचीबद्ध श्रेणियों में फिट बैठती है या नहीं।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: धारा 100 किसी भी हमलावर को मार डालने का असीमित अधिकार देती है।
तथ्य: यह अधिकार केवल इस उपबंध के बाद सूचीबद्ध विशेष गम्भीर परिस्थितियों में ही लागू होता है, और केवल धारा 99 द्वारा तय सीमाओं के भीतर, जैसे आवश्यक से अधिक बल का प्रयोग न करना।
मिथक: किसी भी शारीरिक झगड़े में मृत्यु हो जाए तो आप धारा 100 का दावा कर सकते हैं।
तथ्य: न्यायालय यह परखते हैं कि आक्रमण सचमुच सूचीबद्ध गम्भीर श्रेणियों (जैसे मृत्यु या घोर चोट का खतरा) में आता था या नहीं, और प्रत्युत्तर अनुपातिक था या नहीं — न कि मात्र यह कि कोई झगड़ा हुआ था।