बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित वंदे मातरम् को संविधान सभा ने 1950 में राष्ट्रगीत (नेशनल सॉन्ग) के रूप में अपनाया था, जिसे राष्ट्रगान (जन गण मन) के समान दर्जा तो दिया गया, परंतु उसके समान कानूनी संरक्षण नहीं दिया गया। राष्ट्रगान के विपरीत, वंदे मातरम् के प्रयोग और प्रदर्शन को लेकर कोई विस्तृत संवैधानिक या विधिक व्यवस्था नहीं है।

संसद द्वारा इससे संबंधित एक विधेयक पारित किया जाना यह संकेत देता है कि इसकी मान्यता, प्रयोग अथवा प्रचार-प्रसार के विभिन्न पहलुओं को औपचारिक रूप देने हेतु एक विधायी कदम उठाया जा रहा है, हालांकि रिपोर्ट में विधेयक के प्रावधानों का विस्तृत ब्योरा नहीं दिया गया है।

यूपीएससी परीक्षार्थियों के लिए यह विषय राष्ट्रीय प्रतीकों के विकास-क्रम, संवैधानिक परंपराओं (कन्वेंशन) और विधायी कानून के बीच के अंतर, तथा भारत की राजनीति में सांस्कृतिक-राष्ट्रवादी प्रतीकों को लेकर होने वाली बहसों की दृष्टि से प्रासंगिक है।