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सं Samvidhan

Speech & expression

Kedar Nath Singh v. State of Bihar

Supreme Court of India · 1962 · AIR 1962 SC 955

सत्यापन प्रतीक्षित

इस मामले ने यह निर्धारित किया कि भारत का औपनिवेशिक काल का राजद्रोह संबंधी कानून मान्य है, पर केवल सीमित अर्थ में: मात्र सरकार की आलोचना करने पर, चाहे वह कितनी भी कठोर क्यों न हो, आपको राजद्रोह के लिए दंडित नहीं किया जा सकता। यह कानून तभी लागू होता है जब आपके शब्द वास्तव में हिंसा या सार्वजनिक अव्यवस्था को भड़काएँ। इससे नागरिकों को अपनी सरकार की आलोचना करने के अधिकार के लिए अधिक सुरक्षा मिली, ताकि स्वचालित अभियोजन के भय के बिना वे आलोचना कर सकें, यद्यपि स्वयं राजद्रोह कानून विधि-पुस्तकों में बना रहा और उस पर बहस तथा वाद-विवाद जारी रहे।

कहानी

तथ्य

केदार नाथ सिंह, बिहार में फ़ॉरवर्ड कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य, ने एक भाषण दिया जिसमें उन्होंने उकसाने वाली भाषा का प्रयोग करते हुए सत्तारूढ़ काँग्रेस पार्टी और सरकार की तीखी आलोचना की। उनके विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 124A (राजद्रोह) के अंतर्गत अभियोजन चलाया गया और उन्हें दोषी ठहराया गया। उन्होंने धारा 124A की संवैधानिक वैधता को इस आधार पर चुनौती दी कि यह अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार का उल्लंघन करती है।

न्यायालय के समक्ष प्रश्न

क्या दंड संहिता की धारा 124A (राष्ट्रद्रोह का अपराध) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, जो अनुच्छेद 19(1)(a) के अंतर्गत प्रदत्त है, के आलोक में संवैधानिक रूप से वैध है, और यदि वैध है, तो उसका यथोचित दायरा क्या है।

न्यायिक निर्णय

सुप्रीम कोर्ट की एक संविधान पीठ ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 124A की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा, यह मानते हुए कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत स्वीकृत प्रतिबंधों में आती है क्योंकि इसका संबंध लोक व्यवस्था और राज्य की सुरक्षा से है। हालांकि, न्यायालय ने इस प्रावधान की व्याख्या को संकीर्ण करते हुए कहा कि सरकारी उपायों या अधिकारियों की आलोचना, चाहे वह कितनी भी तीखी हो, देशद्रोह तब तक नहीं मानी जाएगी जब तक वह हिंसा के लिए उकसावे के साथ न हो या उसमें लोक व्यवस्था भंग करने अथवा कानून-व्यवस्था में बाधा उत्पन्न करने की प्रवृत्ति न हो। इसी संकीर्ण मानक के आलोक में केदार नाथ सिंह के दोषसिद्धि का परीक्षण किया गया।

यह जिस सिद्धांत का समर्थन करता है

आई.पी.सी. की धारा 124A केवल तभी संवैधानिक है जब उसका संकीर्ण अर्थ लगाया जाए: राजद्रोह तभी बनता है जब बोले या लिखे गए ऐसे शब्द हों जिनमें हिंसा के लिए उकसावे के माध्यम से लोक-व्यवस्था या कानून-व्यवस्था में अशांति उत्पन्न करने की घातक प्रवृत्ति या मंशा हो। सरकार, मंत्रियों या उसकी नीतियों की मात्र आलोचना, चाहे वह तीव्र या प्रखर भाषा में ही क्यों न व्यक्त की गई हो, राजद्रोह नहीं होती और वह अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत संरक्षित अभिव्यक्ति है।

प्रावधान जिनपर इस मामले का प्रभाव पड़ा

सार्वजनिक अभिलेखों से AI-सहायता प्राप्त सारांश। पूर्ण निर्णय पढ़ें: Indian Kanoon.