Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023
धारा 519
Extension of period of limitation in certain cases
Notwithstanding anything contained in the foregoing provisions of this Chapter, any Court may take cognizance of an offence after the expiry of the period of limitation, if it is satisfied on the facts and in the circumstances of the case that the delay has been properly explained or that it is necessary so to do in the interests of justice.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
कठोर समय-सीमाएँ सामान्यतः समझदारीपूर्ण होते हुए भी असामान्य मामलों में अन्यायपूर्ण परिणाम दे सकती हैं—जैसे पीड़ित अत्यधिक आघात या धमकियों के कारण समय पर कार्रवाई न कर सका हो, या किसी के नियंत्रण से परे वास्तविक परिस्थितियों ने विलंब कराया हो। यह सुरक्षा-वाल्व प्रावधान अदालतों को सीमित विवेक देता है कि वे सख्त समय-सीमा से परे भी वास्तव में पात्र मामले सुन सकें, जिससे निश्चितता और निष्पक्षता में संतुलन बना रहे। यह पूर्ववर्ती दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 473 से मेल खाता है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
समकक्ष दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) प्रावधान को लागू करते हुए न्यायालयों ने सावधान किया है कि यह एक अपवाद है, जिसका उपयोग संयम से और तभी हो जब विलंब का सच्चा और संतोषजनक औचित्य प्रस्तुत हो, या जब कोई प्रबल ‘न्याय के हित’ का कारण हो—यह सीमा-काल की रूपरेखा को सामान्यतः दरकिनार करने के लिए नहीं है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह धारा न्यायालयों को सुविधा अनुसार सीमा-काल को स्वतंत्र रूप से अनदेखा करने देती है।
तथ्य: न्यायालयों से अपेक्षा है कि वे इस शक्ति का इस्तेमाल संयम से करें—केवल वहीं, जहाँ विलंब का कारण वास्तविक और संतोषजनक हो, या जहाँ न्याय के हित सच में इसकी मांग करें; इसे नियमित तौर पर सीमा-काल को निष्प्रभावी करने के लिए नहीं बरतना चाहिए।