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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 1

Short title, extent and commencement

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

भारत के उत्तर-पूर्वी जनजातीय क्षेत्रों, विशेषकर संविधान की षष्ठ अनुसूची (Sixth Schedule) के अंतर्गत आने वाले इलाकों, को उनकी विशिष्ट प्रथागत व्यवस्थाओं, सामाजिक संरचनाओं और मुख्यधारा की प्रशासनिक-न्यायिक प्रणाली से सीमित एकीकरण के इतिहास के कारण, शासन और विधि में लंबे समय से विशेष स्वायत्तता प्राप्त है। यह अपवाद पूर्ववर्ती दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के ढांचे का ही विस्तार है, जिसमें भी नागालैंड और असम के कुछ जनजातीय क्षेत्रों पर पूर्ण लागू करने से छूट दी गई थी, ताकि स्थानीय स्वशासन का सम्मान बना रहे, जबकि गंभीर विषय (जैसे अध्याय IX, XI, XII — जिनमें सुरक्षा कार्यवाही, लोक-व्यवस्था और निवारक कार्रवाई जैसे विषय आते हैं) पूरे देश में समान रूप से लागू रहें। विलंबित प्रवर्तन का प्रावधान एक मानक विधायी तकनीक है, जिससे सरकार को आधारभूत ढांचा तैयार करने, अधिकारियों के प्रशिक्षण और नियम बनाने का समय मिल जाता है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

नई संहिता (BNSS) हाल में बनी है, इसलिए इसके इस विशेष अपवाद खंड पर अभी पर्याप्त न्यायिक उदाहरण उपलब्ध नहीं हैं। हालांकि, न्यायालयों ने पूर्व की दंड प्रक्रिया संहिता (धारा 1(2)) के अंतर्गत समान अपवादों को संवैधानिक रूप से वैध माना है, षष्ठ अनुसूची (Sixth Schedule) के अंतर्गत जनजातीय क्षेत्रों की विशेष स्थिति और विधायिका की क्षेत्रीय स्वायत्तता की आवश्यकताओं के अनुरूप दंड प्रक्रिया ढालने की शक्ति को स्वीकार करते हुए।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह कहना गलत है कि BNSS कभी भी नागालैंड या उपर्युक्त जनजातीय क्षेत्रों में लागू नहीं होता।

    तथ्य: अध्याय IX, XI और XII वहां हर समय लागू रहते हैं, और राज्य सरकार अधिसूचना के माध्यम से, आवश्यक संशोधनों के साथ, अन्य प्रावधानों का भी विस्तार कर सकती है।

  • मिथक: यह कथन गलत है कि BNSS संसद से पारित होते ही विधिक रूप से लागू और प्रवर्तनीय हो गया।

    तथ्य: यह केवल उस विशिष्ट तारीख को प्रभाव में आता है जिसे बाद में केंद्रीय सरकार राजपत्र के माध्यम से अधिसूचित करती है।