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सं Samvidhan

Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023

धारा 53

Liability of abettor for an effect caused by act abetted different from that intended by

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह नियम उकसावे (अभियोजन) के कानून में एक खाई भरता है। इसके बिना, जो व्यक्ति अपराध कराने की पहल करता है, वह सिर्फ इसलिए सख़्त दंड से बच सकता था कि वास्तविक नतीजा (जैसे मृत्यु) उससे भी बुरा निकला जो उसने साफ़ तौर पर चाहा था (जैसे चोट)। 1860 के पुराने भारतीय दंड संहिता की धारा 111 से आगे बढ़ाया गया यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि उकसाने वाले संभावित रूप से बढ़ते नुकसान से जुड़ी जिम्मेदारी से न बच पाएं, और साथ ही उन्हें उन नतीजों की देनदारी से बचाता है जिनका वे बिलकुल अनुमान ही नहीं कर सकते थे।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालय लंबे समय से मानते आए हैं कि इस तरह के प्रावधान के अंतर्गत दायित्व का केंद्र बिंदु उकसाने वाले की संभावित परिणामों के बारे में जानकारी है, केवल घोषित अभिप्राय नहीं। न्यायालय उकसाए गए कृत्य की प्रकृति (उदा., जितनी गंभीर मारपीट उकसाई गई थी) का परीक्षण करते हैं ताकि यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि क्या उकसाने वाला मृत्यु जैसे अधिक गम्भीर नतीजे का युक्तिसंगत पूर्वानुमान कर सकता था। यह पुराने दंड संहिता के समान प्रावधान की व्याख्याओं के अनुरूप है, जहाँ न्यायालय लगातार यह शर्त रखते रहे हैं कि अनपेक्षित, अधिक गंभीर नतीजे तक दायित्व बढ़ाने से पहले उकसाने वाले की पूर्वदृष्टि का प्रमाण होना चाहिए।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: उकसाने वाले को सिर्फ वही सज़ा मिलती है जो उसने ठीक‑ठीक माँगी थी, उससे बुरे नतीजे के लिए कभी नहीं।

    तथ्य: कानून साफ़ तौर पर यह भी तय करता है कि उकसाने वाला अधिक बुरे या भिन्न परिणाम के लिए भी उत्तरदायी होगा, बशर्ते उसे मालूम था कि वह परिणाम उस कृत्य का सम्भावित नतीजा है जिसे उसने प्रोत्साहित किया।

  • मिथक: जोखिम के ज्ञान का कोई मतलब नहीं — केवल मूल अभिप्राय ही मायने रखता है।

    तथ्य: यहाँ ‘ज्ञान’ ही प्रमुख विधिक शर्त है; जब तक यह सिद्ध न हो कि उकसाने वाले को अधिक गम्भीर नतीजे की संभावना का पता था, इस धारा के तहत उसे उस बड़े नुकसान के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता।