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सं Samvidhan

Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023

धारा 248

False charge of offence made with intent to injure

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

आपराधिक न्याय प्रणाली का दुरुपयोग झूठी प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफ़.आई.आर.) और गढ़ी हुई शिकायतों के ज़रिए निर्दोष लोगों को परेशान करने के लिए किया जा सकता है। यह प्रावधान, जो पहले Indian Penal Code, 1860 की धारा 211 था, दुर्भावनापूर्ण अभियोजन को हतोत्साहित करता है—क्योंकि जो व्यक्ति जानबूझकर किसी को चोट पहुँचाने के इरादे से निराधार आपराधिक मामला दायर करता है, उसे दंडित किया जाता है, और जब गढ़ा हुआ आरोप किसी अत्यंत गंभीर अपराध से जुड़ा हो तो दंड विशेष रूप से कड़ा होता है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

धारा 211 IPC (और उसका BNS समकक्ष) का भारतीय न्यायालयों में अक्सर सहारा लिया गया है, खासकर तब जब व्यक्तिगत शत्रुता, संपत्ति विवाद, या दांपत्य टकराव से उपजी कथित झूठी एफ़.आई.आर. का प्रश्न हो; न्यायालय बार‑बार यह रेखांकित करते हैं कि मूल मामले में मात्र बरी हो जाना अपने‑आप दुर्भावना सिद्ध नहीं करता, और इस अपराध के成立 होने से पहले जानबूझी हुई असत्यता तथा चोट पहुँचाने के इरादे का पृथक निष्कर्ष आवश्यक है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यदि किसी आपराधिक मामले में कोई व्यक्ति बरी हो गया, तो जिसने उसके विरुद्ध शिकायत की थी, वह स्वतः ही यह अपराध कर बैठा माना जाएगा।

    तथ्य: न्यायालय यह प्रमाण माँगते हैं कि अभियोगकर्ता को पता था कि आरोप निराधार है और उसका उद्देश्य अभियुक्त को चोट पहुँचाना था; केवल बरी हो जाना अपने‑आप यह सिद्ध नहीं करता कि मूल शिकायत दुर्भावनापूर्ण या झूठी थी।