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सं Samvidhan

Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023

धारा 222

Omission to assist public servant when bound by law to give assistance

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

औपनिवेशिक काल के कानून (मूलतः IPC की धारा 187) ने माना था कि लोक सेवक—विशेषकर पुलिस और दंडाधिकारी—अक्सर अकेले कानून लागू नहीं कर सकते और उन्हें साधारण नागरिकों की सहायता की आवश्यकता पड़ सकती है, जैसे भाग रहे संदिग्ध को पकड़ना या दंगा नियंत्रित करना। अनेक अन्य कानून (जैसे दंड प्रक्रिया संहिता/भारतीय नागरिका सुरक्षा संहिता [Code of Criminal Procedure/Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita]) नागरिकों पर पुकारे जाने पर सहायता का वैध दायित्व डालते हैं। यह प्रावधान जानबूझकर इंकार पर आपराधिक दंड जोड़कर उन दायित्वों को सुदृढ़ करता है, ताकि सार्वजनिक व्यवस्था और कानून प्रवर्तन नागरिक-असहयोग से कमजोर न हों।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: कोई भी व्यक्ति जो पुलिस अधिकारी की सहायता नहीं करता, उसे इस कानून के तहत दंडित किया जा सकता है।

    तथ्य: यह कानून तभी लागू होता है जब आप पहले से किसी अन्य कानून द्वारा वह सहायता देने के लिए विधिक रूप से बाध्य हों—यह सभी पर सामान्यतः लागू नहीं होता।

  • मिथक: डर के कारण या भूलवश सहायता से इंकार करना एक अपराध है।

    तथ्य: इस धारा में चूक का जानबूझकर होना आवश्यक है; आकस्मिक या अपरिहार्य रूप से सहायता न कर पाना अपराध के दायरे में नहीं आता।

  • मिथक: केवल पुलिस अधिकारी ही इस प्रावधान का सहारा ले सकते हैं।

    तथ्य: यह किसी भी लोक सेवक पर लागू होता है जो सार्वजनिक कर्तव्य का निर्वहन कर रहा हो, केवल पुलिस तक सीमित नहीं है।