Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023
धारा 220
Illegal purchase or bid for property offered for sale by authority of public servant
Whoever, at any sale of property held by the lawful authority of a public servant, as such, purchases or bids for any property on account of any person, whether himself or any other, whom he knows to be under a legal incapacity to purchase that property at that sale, or bids for such property not intending to perform the obligations under which he lays himself by such bidding, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to one month, or with fine which may extend to two hundred rupees, or with both.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह प्रावधान (पुराने Indian Penal Code की धारा 169 से लिया गया) आधिकारिक विक्रयों—जैसे न्यायालयी नीलामियों या सरकार द्वारा आदेशित संपत्ति-विक्रयों—की शुचिता की रक्षा करता है, ताकि लोग प्रक्रिया के साथ छल न कर सकें। सार्वजनिक नीलामियों में प्रायः कुछ खरीदारों को बाहर रखा जाता है (उदाहरणतः दिवालिया देनदार को अपनी ही नीलाम हुई संपत्ति पुनः खरीदने से रोका जा सकता है, या विक्रय कराने वाले अधिकारी को बोली लगाने से रोका जा सकता है)। यह कानून उन झूठी बोलियों पर भी रोक लगाता है जिनका निर्वाह करने का बोलीदाता का इरादा ही न हो; ऐसी हरकत नीलामी को बाधित कर सकती है, वास्तविक बोलीदाताओं को हतोत्साहित कर सकती है, या अंतिम मूल्य में हेरफेर कर सकती है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह कानून केवल बड़ी संपत्ति-नीलामियों पर लागू होता है, छोटे सरकारी विक्रयों पर नहीं।
तथ्य: यह कानून किसी भी ऐसे संपत्ति-विक्रय पर लागू होता है जो किसी लोक सेवक के वैध अधिकार के अंतर्गत कराया गया हो, चाहे संपत्ति का आकार या मूल्य कुछ भी हो।
मिथक: यदि आप पर खरीदारी की रोक है तो भी किसी और से अपने स्थान पर बोली लगवाकर आप दायित्व से बच सकते हैं।
तथ्य: यदि जो व्यक्ति आपकी ओर से बोली लगा रहा है उसे मालूम है कि आप पर क़ानूनन खरीदने की रोक है, तो वह आपके खाते पर बोली लगाने के लिए इस धारा के अंतर्गत उत्तरदायी ठहराया जा सकता है।
मिथक: जीतकर बाद में भुगतान न करना सिर्फ दीवानी मसला है, आपराधिक नहीं।
तथ्य: यदि कोई व्यक्ति बोली लगाते समय ही उस बोली से उत्पन्न दायित्वों का निर्वाह कभी न करने का इरादा रखता है, तो यह धारा उसे महज़ निजी संविदात्मक विफलता नहीं, बल्कि आपराधिक अपराध मानती है।