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सं Samvidhan

Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023

धारा 216

False statement on oath or affirmation to public servant or person authorised to

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 181 का सतत रूप है। इसका उद्देश्य प्राधिकारियों के समक्ष चालित आधिकारिक कार्यवाहियों—जैसे पुलिस जाँच, शपथपत्र, अधिकरणीय सुनवाई, या प्रशासनिक सत्यापन—की निष्पक्षता और विश्वसनीयता की रक्षा करना था, जहाँ व्यक्ति पर शपथ लेकर सत्य बोलने का बंधन होता है। ऐसे प्रतिरोधक के बिना, प्राधिकारियों के समक्ष दिए गए शपथयुक्त घोषणाएँ प्रभावहीन हो जातीं और जाँच-पड़ताल, लाइसेंसिंग प्रक्रियाएँ तथा नागरिकों के सत्यनिष्ठ सहयोग पर निर्भर प्रशासनिक निर्णय-निर्माण कमज़ोर पड़ जाता।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

समान आईपीसी प्रावधान के अंतर्गत न्यायालयों ने माना है कि अपराध तभी बनता है जब व्यक्ति शपथ या प्रतिज्ञान से क़ानूनी रूप से बाध्य हो; ऐसी क़ानूनी बाध्यता के बिना दिया गया साधारण या स्वैच्छिक कथन इस धारा के दायरे में नहीं आता। न्यायालयों ने इसे न्यायालयीन कार्यवाहियों में झूठे साक्ष्य से सम्बन्धित अलग धाराओं के अधीन ‘कपटसाक्ष्य (परजरी)’ से भी पृथक बताया है, स्पष्ट करते हुए कि धारा 216 (पूर्व में आईपीसी धारा 181) विशेष रूप से न्यायालय-कक्ष से बाहर लोक सेवकों के समक्ष—जैसे प्रशासनिक पूछताछ या पुलिस जाँच के दौरान—दिए गए शपथयुक्त बयानों पर लागू होती है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह कहना सही नहीं है कि यह धारा किसी भी सरकारी कर्मचारी से कही गई हर झूठ पर लागू होती है।

    तथ्य: यह तभी लागू होती है जब व्यक्ति उस विशिष्ट विषय पर सत्य बोलने के लिए शपथ या प्रतिज्ञान से क़ानूनी रूप से बाध्य था—साधारण बातचीत या अनौपचारिक बयान इस दायरे में नहीं आते।

  • मिथक: यह न्यायालय में झूठे बयान (परजरी) के समान नहीं है।

    तथ्य: न्यायालयों ने इसे न्यायिक कार्यवाहियों में झूठा साक्ष्य देने से पृथक माना है; यह धारा औपचारिक न्यायालयी गवाही से बाहर, जैसे प्रशासनिक या अन्वेषण प्रक्रियाओं के दौरान, लोक सेवकों के समक्ष दिए गए शपथयुक्त असत्य बयानों को कवर करती है।