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सं Samvidhan

Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023

धारा 189

Unlawful assembly

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

भारतीय दंड संहिता (1860) का मसौदा तैयार करने वाले उपनिवेशकालीन विधिनिर्माताओं को भीड़ और संगठित समूहों द्वारा सामूहिक बल के इस्तेमाल से अधिकारियों को डराने, कानून का प्रतिरोध करने, या संपत्ति व अधिकारों पर कब्जा करने की चिंता थी। सामूहिक कृत्य को व्यक्तिगत अपराध से अधिक खतरनाक माना गया क्योंकि संख्या लोगों को उकसाती है और पुलिसिंग को कठिन बनाती है। पुरानी IPC की धाराएँ 141-145 ने यह ढाँचा बनाया, और लगभग अपरिवर्तित रूप से इसे भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 189 में आगे बढ़ाया गया है, जो दिखाता है कि मूल समस्या—भीड़ का जबरदस्ती पर उतारू होना—भारत में लोक-व्यवस्था के कानून के लिए आज भी सतत चिंता है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

पूर्ववर्ती IPC प्रावधानों के तहत, न्यायालयों ने बार-बार ज़ोर दिया कि केवल भीड़ में मौजूद होना पर्याप्त नहीं है; अभियोजन को दिखाना होगा कि व्यक्ति ने जमाव के अवैध ‘सामान्य उद्देश्य’ (कॉमन ऑब्जेक्ट) को साझा किया और उसे जानते हुए शामिल हुआ या बना रहा (Baladin v. State of U.P. तथा बाद के मामलों में)। न्यायालयों ने यह भी माना कि सामान्य उद्देश्य जमाव के दौरान विकसित या परिवर्तित हो सकता है, अर्थात शांतिपूर्ण भीड़ भी कार्यक्रम के बीच में ‘अवैध’ बन सकती है (उपधारा (1) के स्पष्टीकरण में परिलक्षित, जो Moti Das v. State of Bihar में साझा उद्देश्य संबंधी तर्क से जुड़ता है)। न्यायाधीशों ने केवल संख्या पर निर्भर रहने के बजाय आचरण, साथ लाए गए हथियार और लगाए गए नारे देखकर सामान्य उद्देश्य का अनुमान किया है। क्योंकि BNS की धारा 189 बड़े पैमाने पर पुरानी IPC की ही भाषा दोहराती है, यह स्थापित न्यायनिर्णय आगे भी व्याख्या को दिशा देगा।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: सिर्फ उस भीड़ में मौजूद होना जहाँ कुछ अवैध हो रहा है, इस धारा के तहत आपको दोषी बना देता है।

    तथ्य: न्यायालयों ने माना है कि मात्र उपस्थिति पर्याप्त नहीं है—आपको जमाव के अवैध सामान्य उद्देश्य को जानते हुए उसमें शामिल होना या बने रहना चाहिए।

  • मिथक: किसी जमाव को ‘अवैध जमाव’ मानने के लिए उसका आरंभ से ही अवैध होना आवश्यक है।

    तथ्य: उपधारा (1) के स्पष्टीकरण से स्पष्ट है कि कोई वैध सभा भी यदि उसका साझा उद्देश्य बदल जाए तो आगे चलकर अवैध जमाव बन सकती है।

  • मिथक: केवल वे लोग दंडित किए जा सकते हैं जो वास्तव में हिंसा करते हैं।

    तथ्य: यह धारा उन लोगों को भी दंडित करती है जो ऐसे जमावों के लिए लोगों को रखते हैं, आयोजित करते हैं, पनाह देते हैं, या केवल शामिल होने की पेशकश करते हैं—भले ही अब तक कोई हिंसा हुई न हो।