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सं Samvidhan

The Constitution of India

अनुच्छेद 99

सदस्यों द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान

सदस्यों द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान— संसद् के प्रत्येक सदन का प्रत्येक सदस्य अपना स्थान ग्रहण करने से पहले, राष्ट्रपति या उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त व्यक्ति के समक्ष, तीसरी अनुसूची में इस प्रयोजन के लिए दिए गए प्ररूप के अनुसार, शपथ लेगा या प्रतिज्ञान करेगा और उस पर अपने हस्ताक्षर करेगा ।

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह अनुच्छेद सुनिश्चित करता है कि संसद में प्रवेश करने वाला हर व्यक्ति, कोई भी सदस्यीय अधिकार या विशेषाधिकार प्रयोग करने से पूर्व, सार्वजनिक और औपचारिक रूप से भारत के संविधान तथा भारत की प्रभुता और अखंडता को बनाए रखने का संकल्प करे। यह ब्रिटेन और अन्य जनतांत्रिक व्यवस्थाओं की संसदीय परंपराओं से प्रेरित है, जहाँ शपथ ‘उम्मीदवार’ से ‘सदस्य’ तक के औपचारिक, विधिक परिवर्तन का संकेत होती है और यह भी सुनिश्चित करती है कि केवल वे ही लोग कानून-निर्माण में भाग लें जो संवैधानिक व्यवस्था के प्रति निष्ठा की पुष्टि करने को तैयार हों।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

अदालती व्याख्या प्रायः रही है कि शपथ लेना सांसद के रूप में काम करने की अनिवार्य पूर्व-शर्त है—शपथ से पहले सदस्य न मतदान कर सकता है, न बोल सकता है, न भत्ता ले सकता है। विवाद इस बात पर उठे हैं कि शपथ दिलाने की प्रक्रिया कैसे हो (जैसे, क्या उसमें अतिरिक्त शब्द, संकेत या आपत्तियाँ जोड़कर पढ़ना उसे अमान्य कर देता है), और न्यायालयों तथा पीठासीन अधिकारियों को तय करना पड़ा है कि क्या ऐसे परिवर्तनों का अर्थ तृतीय अनुसूची में निर्दिष्ट रूप के अनुसार शपथ लेने से इंकार है; यह गंभीर विषय है, क्योंकि अपूर्ण/अयोग्य शपथ सदस्य के बैठने और मतदान करने की पात्रता को प्रभावित कर सकती है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: सिर्फ चुनाव जीतते ही कोई व्यक्ति अपने आप संसद का पूर्ण सदस्य बन जाता है और उसे सभी अधिकार व शक्तियाँ मिल जाती हैं।

    तथ्य: किसी व्यक्ति को संसद में बैठने, मतदान करने या कार्यवाही में भाग लेने से पहले अनुच्छेद 99 के अंतर्गत शपथ या प्रतिज्ञान लेना आवश्यक है।

  • मिथक: सदस्य शपथ के लिए अपनी पसंद के कोई भी शब्द चुन सकते हैं।

    तथ्य: शपथ या प्रतिज्ञान संविधान की तृतीय अनुसूची में दिए गए ठीक-ठीक प्रारूप के अनुसार ही होना चाहिए।